हमारा उत्तराखंडी भै बन्धुन,
छकि-छकिक खाई,
मन मा लिनि संकल्प,
प्यारू उत्तराखंड राज्य बणाई.
आज उत्तराखंड मा होणु छ,
कोदा-झंगोरा कू त्रिस्कार,
जैसी करदा था पहाड़ी लोग,
पुरातन काल सी प्यार.
कथगा सवादि होन्दु छ,
बल झोळी अर झंगोरू,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
कंक्र्याळु घर्या घ्यू,
परदेश मा कखन खाण,
तरसेंदु छ पापी ज्यू.
झंगोरा की लसपसी तस्मैं ,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
पहाड़ी आलू कू थिंच्वाणि,
जख्या कू लग्युं हो तड़का,
तर्स्युं छ पापी पराणि.
पित्रुन अर वीर भड़ुन,
कोदु-झंगोरू खाई,
अतीत सी अपणा पुंगड़ौं मा,
प्यारा पहाड़ कू पौष्टिक,
कोदु-झंगोरू उगाई.
कुछ त सोचा मन मा,
कोदु-झंगोरू छ कथगा प्यारू,
उत्तराखंड की धरती कू बीज छ,
पौष्टिकता की नजर मा,
दुनियां मा सबसि न्यारू.
निर्बिजू न करा आज,
कोदा-झंगोरा कू बीज बचावा,
नया उत्पाद बणैक बजार मा,
कोदा-झंगोरा की धाक जमावा.
पहाड़ की पारम्परिक विरासत,
छन हमारी फसल पात,
न करा त्रिस्कार आज,
भै-बन्धु निछ भलि बात.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिनांक:२७.९.२०१०, पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.
छकि-छकिक खाई,
मन मा लिनि संकल्प,
प्यारू उत्तराखंड राज्य बणाई.
आज उत्तराखंड मा होणु छ,
कोदा-झंगोरा कू त्रिस्कार,
जैसी करदा था पहाड़ी लोग,
पुरातन काल सी प्यार.
कथगा सवादि होन्दु छ,
बल झोळी अर झंगोरू,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
कंक्र्याळु घर्या घ्यू,
परदेश मा कखन खाण,
तरसेंदु छ पापी ज्यू.
झंगोरा की लसपसी तस्मैं ,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
पहाड़ी आलू कू थिंच्वाणि,
जख्या कू लग्युं हो तड़का,
तर्स्युं छ पापी पराणि.
पित्रुन अर वीर भड़ुन,
कोदु-झंगोरू खाई,
अतीत सी अपणा पुंगड़ौं मा,
प्यारा पहाड़ कू पौष्टिक,
कोदु-झंगोरू उगाई.
कुछ त सोचा मन मा,
कोदु-झंगोरू छ कथगा प्यारू,
उत्तराखंड की धरती कू बीज छ,
पौष्टिकता की नजर मा,
दुनियां मा सबसि न्यारू.
निर्बिजू न करा आज,
कोदा-झंगोरा कू बीज बचावा,
नया उत्पाद बणैक बजार मा,
कोदा-झंगोरा की धाक जमावा.
पहाड़ की पारम्परिक विरासत,
छन हमारी फसल पात,
न करा त्रिस्कार आज,
भै-बन्धु निछ भलि बात.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिनांक:२७.९.२०१०, पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.