Tuesday, November 2, 2010

"पहाड़ कू कोदु-झंगोरू"

हमारा उत्तराखंडी भै बन्धुन,
छकि-छकिक खाई,
मन मा लिनि संकल्प,
प्यारू उत्तराखंड राज्य बणाई.

आज उत्तराखंड मा होणु छ,
कोदा-झंगोरा कू त्रिस्कार,
जैसी करदा था पहाड़ी लोग,
पुरातन काल सी प्यार.

कथगा सवादि होन्दु छ,
बल झोळी अर झंगोरू,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
कंक्र्याळु घर्या घ्यू,
परदेश मा कखन खाण,
तरसेंदु छ पापी ज्यू.

झंगोरा की लसपसी तस्मैं ,
कोदा की रोठ्ठी का दगड़ा,
पहाड़ी आलू कू थिंच्वाणि,
जख्या कू लग्युं हो तड़का,
तर्स्युं छ पापी पराणि.

पित्रुन अर वीर भड़ुन,
कोदु-झंगोरू खाई,
अतीत सी अपणा पुंगड़ौं मा,
प्यारा पहाड़ कू पौष्टिक,
कोदु-झंगोरू उगाई.

कुछ त सोचा मन मा,
कोदु-झंगोरू छ कथगा प्यारू,
उत्तराखंड की धरती कू बीज छ,
पौष्टिकता की नजर मा,
दुनियां मा सबसि न्यारू.

निर्बिजू न करा आज,
कोदा-झंगोरा कू बीज बचावा,
नया उत्पाद बणैक बजार मा,
कोदा-झंगोरा की धाक जमावा.

पहाड़ की पारम्परिक विरासत,
छन हमारी फसल पात,
न करा त्रिस्कार आज,
भै-बन्धु निछ भलि बात.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिनांक:२७.९.२०१०, पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.

"पर्वतजन का आंसू"

आज उत्तराखंड का लोग,
कुदरत का कहर सी,
मानसिक रूप सी त्रस्त छन,
विनाश लीला का बाद,
घर-बार ऊजड़िग्यन,
कैका परिजन दबिक,
यीं दुनियां सी चलिग्यन,
आज उंकी व्यथा-दशा,
सुण्न वाळु क्वी निछ,
नेता, अफसर सुनिन्द,
रासण की व्यवस्था भंग,
बिजली का बिना अँधेरू,
बाटा घाटा बन्द ह्वैगिन,
रड़डा-पाखा झड़दा बिट्टा,
दरकदा पैत्रिक कूड़ा,
पहाड़ आज डरौणु छ,
पर्वतजन तैं कुजाणि किलै?
क्या कसूर छ ऊँकू?
कू पोंज्लु ऊँका आंसू,
कू दिलालु दिलासु,
आज ऊँ फर अयिं छ,
बिना बुलैयिं आफत.....

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिनांक:२३.९.२०१०, पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.

"उत्तराखंड मा बसगाळ-२०१०"

उत्तराखंड मा भादौं का मैना,
गाड, गदनौं अर धौळ्यौंन,
धारण करि ऐंसु विकराल रूप,
अतिवृष्टिन मचाई ऊत्पात,
नाश ह्वैगि कूड़ी, पुंगड़्यौं कू,
जान भि चलिगि मनख्यौं की,
आज पर्वतजन छन हताश,
प्राकृतिक आफत सी,
निबटण कू क्या विकल्प छ?
आज ऊँका पास .

संचार, बिजली, सड़क संपर्क,
छिन्न भिन्न ह्वैगी,
अँधियारी सब जगा छैगी,
हरी जी की नगरी,
विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार मा,
शिव शंकर जी की,
मानव निर्मित विशाल मूर्ति,
गंगा नदी का बहाव मा,
धराशयी ह्वैक बल,
कुजाणि कख बगिगी,
यनु लगदु भगवान शिव शंकर,
प्रकृति का कोप का अगनै,
असहाय कनुकै ह्वैगी?

यनु लगणु छ आज,
लम्पु-लालटेन कू युग,
पहाड़ मा बौड़िक ऐगी,
बसगाळ बर्बादी ल्हेगी,
सब्ब्यौं का मन की बात,
जुमान फर ऐगी,
हे लठ्यालौं आज,
पहाड़ की भौत बर्बादी ह्वैगी.

पहाड़ की ठैरीं जिंदगी,
ठण्डु मठु जगा फर आली,
पहाड़ फर आफत की घड़ी,
बद्रीविशाल जी की कृपा सी,
बगत औण फर टळि जाली,
पर मनख्यौं का मन मा,
"उत्तराखंड मा बसगाळ-२०१०" की,
दुखदाई अतिवृष्टि की याद,
एक आफत का रूप मा बसिं रलि.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिनांक:२२.९.२०१०, पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.
http://himalayauk.org/2010/09/23/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a0%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80/

"तीन पराणी"

"तीन पराणी"

एक गौं का तीन पराणी,
घन्ना, मंगतु, मोळू,
ऊँचि धार मां बैठि बोल्दा,
कब होलु मुंड निखोळू.

घन्ना भै फर रोग लगिगी,
पेण लग्युं छ दारू,
समझावा त बोल्दु छ,
कन्नु मुर्दा मरि तुमारू.

जन्म बिटि छ निर्पट लाटू,
फुंड धोल्युं स्यु मोळू,
उल्टा काम करिक बोल्दु,
कब होलु मुंड निखोळू.

मंगत्या बण्युं छ मंगतु गौं माँ,
या छ वैकि लाचारी,
अळगस का बस ह्वैक होईं छ,
दुनिया वैकी न्यारी.

जब जब कठा होंदा छन,
गौं का यी तीन पराणी,
छुयों माँ सी बिल्मै जांदा,
ब्वयै रन्दि, तौंकी भट्याणि.

तौ भी सैडा गौं का लोग बोंना छन,
यी छन हमारा लाल,
ऊंसी त यी भला ही छन,
जौन छोडि़याली गढ़वाल.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(१०.६.२००६ को रचित, मेरा पहाड़ और यंग उत्तराखंड पर प्रकाशित)

पोस्टेड:३०.०५.२००८

jayara@yahoo.com
Source: Young Uttarakhand Forum

दीपावली-2010

दीप जलेंगे घर हमारे,
आ रही है दीपावली,
रोशन हो जीवन सबका,
प्यारे मित्रों,
एक दीप जलाकर,
याद करना उनको भी,
जो हमसे बिछुड़ गए,
जैसे जनकवि "गिर्दा" जी,
पहाड़ पर आई आपदा में,
स्वर्ग सिधारे प्यारे पर्वतजन.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
दिनांक: २.११.२०१०
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)

Friday, July 2, 2010

"हिमालय बचावा"

"हिमालय बचावा"

आज आवाज उठणि छ,
कैन करि यनु हाल वैकु,
हे चुचों! यनु त बतावा,
हिम विहीन होणु छ,
जख डाळु नि जम्दु,
हिमालय सी पैलि,
वे हरा भरा पहाड़ बचावा,
बांज, बुरांश, देवदार लगावा,
कुळैं कू मुक्क काळु करा,
जैका कारण लगदि छ आग,
सुखदु छ छोयों कू पाणी,
अंग्रेजु के देन छ कुळैं,
पहाड़ हमारा पराण छन,
वैकी सही कीमत पछाणा.

कनुकै बचलु हिमालय?
वैका न्योड़ु गाड़ी मोटर न ल्हिजावा,
तीर्थाटन की जगा पर्यटन संस्कृति,
जैका कारण होणु छ प्रदूषण,
पहाड़ की ऊँचाई तक,
ह्वै सकु बिल्कुल न फैलावा.

पहाड़ कूड़ा घर निछ,
प्रकृति का सृंगार मा खलल,
वीं सनै कतै न सतावा,
ये प्रकार सी प्रयास करिक,
प्यारा पहाड़ बचावा,
हिंवाळी काँठी "हिमालय बचावा".

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
२१.८.२००७ को रचित....दिल्ली प्रवास से

"नाती की पाती"

"नाती की पाती"

दादा चश्मा लगैक,
पढ़ण लग्युं छ,
"नाती की पाती",
क्या होलु लिख्युं?

नाती लिखणु छ,
दादा जी क्या बतौण,
तुमारी याद मैकु,
अब भौत सतौणि छ,
बचपन मा तुम दगड़ी,
जू दिन बितैन,
अहा! उंकी याद अब,
मन मा औणि छ.

आज भि मैं याद छ,
जै दिन मैन ऊछाद करि थौ,
तब आपन मैकु,
पुळैक खूब समझाई,
पर मेरा बाळा मन मा,
उबरी समझ नि आई.

अब मैं बिंगण लग्युं छौं,
आपसी आज दूर हवैग्यौं,
पुराणी यादु मा ख्वैग्यौं,
अब मैन जब घौर औलु,
चिठ्ठी मा जरूर लिख्यन,
क्या ल्ह्यौण तुमारा खातिर,
अब ख़त्म कन्नु छौं पाती,
तुमारा मन कू प्यारू,
मैं तुमारु नाती.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
२१.८.२००७ को रचित....दिल्ली प्रवास से

मलेेथा की कूल