Thursday, May 19, 2011

"यनु बोल्दा छन"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")

मेरा मुल्क खासपट्टी,
टिहरी गढ़वाल मा,
दाना सयाणा भै बन्ध.....

बरखा बरखी डागर,
द्योरू बरखी डागर,
तब त समझा सच छ,
खासपट्टी मा अबरखण,
हळसुंगि बल काकर,
बल "यनु बोल्दा छन".....

छाँछ मागण जाण त,
भांडु क्यौकु लुकौण,
ज्व बात सच छ,
कतै नि छुपौण,
बल "यनु बोल्दा छन".....

गंगा जी का छाला फुन्ड,
थौ जाण लग्युं,
बल भौ सिंह ठेकेदार,
बोन्न लगि,
त्वैन क्या जाणन,
हे गंगा माई,
यख फुन्ड ऐ थौ,
भौ सिंह ठेकेदार,
वैन धोळ्यन धौळी मा,
रुपया कुछ कल्दार
बल "यनु बोल्दा छन".....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मेरे ब्लॉग और पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक: १६.५.११
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,37.135.html

"कूड़ी बांजा पड़्यन तेरी"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
भारी गाळ माणदा था,
मेरा मुल्क का मनखी,
जू कैन यनु बोल्यालि,
पर आज यनु निछ.......
जौंकी कूड़ी बांजा छन पड़ीं,
हमारा प्यारा मुल्क,
कुमौं अर गढ़वाळ,
समझा आज ऊँकू,
विकास होयुं छ......
विकास की दौड़ मा,
हमारा मुल्क कू,
हरेक मनखी खोयुं छ,
आज आशीर्वाद छ,
जू क्वी यनु बोलु,
"कूड़ी बांजा पड़्यन तेरी"....
(सर्वाधिकार सुरक्षित, पहाड़ी फोरम, मेरे ब्लाग पर प्रकाशित)
दिनांक: १८.५.२०११
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,37.135.html
http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.com/

Monday, May 16, 2011

"झपन्याळि डाळी का छैल"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")

बैठि थौ कबरी, सुण हे दगड़्या,
अपणा प्यारा, मुल्क पहाड़,
दोफरी कू घाम थौ, बगदु बथौं थौ,
डाळी थै झपन्याळि, बांज बुरांस की,
बासण लगिं थै, घुघती हिल्वांस,
हैंसण लग्युं थौ, बण मा बुरांस,
तू भी थै बैठ्युं, जरा याद कर,
बात छ हमारा, प्यारा बाळापन की,
वे दिन दगड़्या, बैठ्युं थौ मैं,
अंग्वाळ मारिक, हे तेरा गैल,
कुलदेवी चन्द्रबदनी का डंडा,
"झपन्याळि डाळी का छैल",
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरे ब्लॉग और पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक: १२.५.२०११

"काफळ खैजा"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")

हमारा मुल्क काफळ पक्याँ,
होयां होला रसीला,
होला क्वी भग्यान खाणा,
प्रभु तेरी क्या लीला....

मन पौन्छ्युं छ वे पहाड़,
आँखी छन फटकणि,
काफळ खाण यख कखन,
होईं छन टरकणि.......

होलु क्वी दगड़्या मेरु,
काफळ दाणी ठुंग्याणु,
हबरि हैंसी हैंसी होलु,
बाजूबंद लगाणु.....

देवभूमि कू रैबार अयुं,
हे चुचा तू ऐजा.....
अपणा बाँठा का काफळ,
ह्वै सकु त खैजा.......
(सर्वाधिकार सुरक्षित, पहाड़ी फोरम, मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित)
दिनांक: १२.५.२०११

Sunday, May 15, 2011

"यनु बोल्दा छन"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")

मेरा मुल्क खासपट्टी,
टिहरी गढ़वाल मा,
दाना सयाणा भै बन्ध.....

बरखा बरखी डागर,
द्योरू बरखी डागर,
तब त समझा सच छ,
खासपट्टी मा अबरखण,
हळसुंगि बल काकर,
बल "यनु बोल्दा छन".....

छाँछ मागण जाण त,
भांडु क्यौकु लुकौण,
ज्व बात सच छ,
कतै नि छुपौण,
बल "यनु बोल्दा छन".....

गंगा जी का छाला फुन्ड,
थौ जाण लग्युं,
बल भौ सिंह ठेकेदार,
बोन्न लगि,
त्वैन क्या जाणन,
हे गंगा माई,
यख फुन्ड ऐ थौ,
भौ सिंह ठेकेदार,
वैन धोळ्यन धौळी मा,
रुपया कुछ कल्दार
बल "यनु बोल्दा छन".....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं मेरे ब्लॉग और पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)
दिनांक: १६.५.११

Tuesday, May 10, 2011

"तेरी हाम छ"

क्या बोन्न, मेरा मुल्क,
घर घर मा आज,
नयाँ जमाना मा,
तेरी हाम छ.

त्वै बिना,
सूर्य अस्त का बाद,
मेरा मुल्क का मनखी,
रगबग करदा छन,
जब तू ऊँका पोटगा पेट,
बैठि जांदी छैं,
ऊँका मन मा,
ऊलार पैदा करदी छैं,
ज्वान अर बुढया का,
तब ऊँ तैं यनु लगदु,
सब्बि धाणि मिलिगी आज,
रात सुपन्याळि ह्वैगी,
अहा! कथगा मजा ऐगी,
बोतळ की बेटी,
आज का जमाना मा,
"तेरी हाम छ"

(रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु")
दिनांक: १०.५.११ सर्वाधिकार सुरक्षित,
प्रकाशित पहाड़ी फोरम और मेरे ब्लॉग पर

Thursday, May 5, 2011

"टिहरी डाम"

जैकी छ हाम,
किलैकि वैका कारण,
बिगळेन मनखी,
दुखेन ऊँका दिल,
यनु भी बोल्दा छन ऊ,
पड़ी हमारी पीठी मा,
मुछाला कू सी डाम.

जी या बात सच छ,
पूछा ऊँ सनै,
क्या ख्वै क्या पाई?
निर्दयी था ऊ,
जौन योजना बणाई,
पहाड़ कू पाणी,
दूर दिल्ली तक पौंछाई,
बिजली बणनी छ,
वा पहाड़ छोड़िक दूर,
ऊँका घौर रोशन कन्नी छ,
जौंकु हक्क कतै निछ,
जौंकु थौ ऊँका घौर,
कखि रोशन त होला,
पर दिल मा दर्दयाळु अंधेरु,
"टिहरी डाम" का कारण.

रचनाकर: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
दिनांक: ५.५.२०११

मलेेथा की कूल