Friday, November 4, 2016

ढ़ोल वादन प्रतियोगिता....



स्वर्गवासी इन्द्रमणि बडोनी जी का,
प्यारा गौं अखोड़ी मा,
ढ़ोल वादन प्रतियोगिता कू,
भव्य अयोजन होणु छ,
सात समुदर पार बिटि बल,
स्टीफन फ्यौंलि दास भी औणु छ......

प्रतियोगिता आयोजन कर्ताओं कू,
हृदय सी करयुं चैन्दु आभार,
जौं सनै छ उत्तराखण्डी ढ़ोल सी,
मन मा अथाह सच्चू प्यार......

पहाड़ का पारम्परिक ढ़ोल्यौं कू,
समय समय फर करयुं चैन्दु मान,
शुभ कार्ज मा ढ़ोल समेत न्यूतिक,
दिन्युं चैन्दु सदानि सच मा सम्मान......

पहाड़ की संस्कृति कू सूचक छ,
हमारु प्यारु उत्तराखण्डी ढ़ोल,
सात समुदर पार तक पौंछिग्यन,
उत्तराखण्डी ढ़ोल का प्यारा बोल.......

श्री शुशील शर्मा जी का प्रयास सी यू आयोजन

अखोड़ी मा,ग्यारह गौं हिंदाव मा 23.10.2016 कू ह्वै
12.10.2016


मेरु जीवन परिचय...




नाम:  जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
जन्म तिथि: 21 जुलाई, 1963
दूरभाष:      09654972366
स्थाई पता: ग्राम: बागी-नौसा, पो.औ.- कुन्डड़ी, पटटी- चंद्रवदनी,
    टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड-249122
वर्तमान पता: सी-20, गली संख्या-3, एम-।। ब्लाक, संगम विहार, नई दिल्ली-110080
संप्रति: उर्वरक विभाग, भारत सरकार में सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर कार्यरत।
पिता:  स्व. कुन्दन सिंह जयाड़ा
माता:  स्व. श्रीमती छीला देवी
पत्नी: श्रीमती भादी देवी
प्रथम पुत्र: श्री चन्द्रमोहन सिंह जयाड़ा
द्वितीय पुत्र: श्री मनमोहन सिंह जयाड़ा

प्राथमिक शिक्षा : प्राईमरी स्कूल, किमधार, एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रणसोलीधार,
              पट्टी: चंद्रवदनी, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।
   
हाईस्कूल : राजकीय इन्टर कालेज, अंजनीसैण टिहरी गढ़वाल(1979)
इंटरमीडिएट : राजकीय इन्टर कालेज, अंजनीसैण टिहरी गढ़वाल(1981)

जीवन का  हत्वपूर्ण मोड :-
कवि नजर से दिल्ली को मैं दर्द भरी दिल्ली कहता हूं।  मेरा अहसास दिल्ली बहुत ही दर्द भरी है।  12 मार्च, 1982 को मैंने पहाड़ से दर्द भरी दिल्ली को पलायन किया।  रोजगार प्राप्ति हुई और जीवन का सफर चलने लगा।  पहाड़ से दूर रहने की कसक, परिजनों और पहाड़ की खुद ने मुझे गढ़वाली कवि बना दिया। हर विषय पर अथाह जिज्ञासा होने के कारण मैंने अपना नाम कवि जिज्ञासू रखा।  मेरे सामने प्रश्न था?  कविताएं हिन्दी में लिखूं या गढवाली में।  मैंने सोचा हिन्दी में लिखने वाले बहुत हैं।  क्यों न अपनी दूधबोलि गढ़वाली भाषा में कविता लिखूं और भाषा का श्रृंगार करुं।  वैसे भी हमारे समाज के लोग अपनी लोक भाषाओ से दूर होते जा रहे हैं। अपनी गढ़वाली कविताओं के माध्यम से उनके मन में भाषा प्रेम पैदा करना मेरा मकसद है।
साहित्यिक परिचय :  
19 जुलाई, 2009 को अंज्वाळ संस्था, फरीदाबाद के सौजन्य से लायंस क्लब में अयोजित कवि सम्मेलन में मैंने पहली बार कविता पाठ में भाग लिया।  उसके बाद कई कवि सम्मेलनों में मुझे कविता पाठ में भाग लेने का मौका मिला।  मेरी कविताओं के पाठक मेरी कविताओं को पढ़कर प्रभाविति होते हैं और उनकी प्रतिक्रिया के कारण मुझे अहसास होता है, मेरा गढ़वाली कविता सृजन करना धन्य हुआ।  उत्तराखण्ड के लोगों के मन में अपनी दूधबोलि भाषा के प्रति प्रेम बढ़ाना मेरा लक्ष्य है।  मेरा प्रथम कविता संग्रह अठ्ठैस बसंत हिमवंत कवि स्व. चन्द्रकुंवर बर्त्वाल जी को समर्पित है।  कविता संग्रह का प्रकाशन कार्य चल रहा है और जल्दि ही इसका विमोचन होगा।
सौभाग्य से मुझे 1995 के लगभग इन्टरनेट की सेवा मिलि और तब से मैंने अपनी गढ़वाली कविताओं को रचकर मेरा पहाड़, यंग उत्तराखण्ड, पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित किया।  मेरी कविताओं के पाठक मेरी कविताओं को पढ़कर प्रभावित होते और मुझे प्रोत्साहित करते।
 मेरी रचनाएं हिलवाणी, उत्तराखण्ड गौरव, रंत रैबार, जागो उत्तराखण्ड, स्टेज एजेन्डा, पर्वतीय धारा, हमर उत्तराखण्ड, कुमगढ़ इत्यादि उत्तराखण्डी पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।
मेरे कविमन की हसरत है, अपने जीवनकाल में अपने संपूर्ण उत्तराखण्ड को अपनी आंखों से निहारुं।  मेरे मन की बात......देवभूमि उत्तराखण्ड को देखूं, उड़कर अनंत आकाश से, नदी पर्वतों को निहारुं, जाकर बिल्कुल पास से।

समाज को संदेश: 
अपनी दूधबोलि भाषा को न त्यागें।  जब तक हम अपनी भाषा बोलेगें तब तक हमारी पहचान गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी के रुप में होगी।  पहाड़ से प्रेरणा लेकर प्रगति शिखर की ओर बढें। भाषा प्रेम होने के कारण अब तक मैंने एक हजार से भी ज्यादा गढ़वालि कविताओं को सृजन किया है।  अपनी कविताओं के माध्यम से मैं अपने समाज के लोगों के मन में भाषा प्रेम बढ़ाने हेतु प्रयासरत हूं।

मेरु रेबार....



अवा दौं लठ्याळौं,
अपणा पहाड़, मेरा धोरा,
चुल्ला की रोठ्ठी खलौलु,
धारा मगरा कू तुम्तैं,
ठंडु ठंडु पाणी पिलौलु,
तुम्त नि खुदेन्दा अब,
मैं ये बंजेदा पहाड़ मा,
दिन रात तुमारी खुद मा,
यकुलांस मा यकुलि,
भौत खुदेणु छौं,
देखा! तुमारा कुलदेव्ता,
कूड़ा, पुंगड़ा, गुठेरा,
खल्याण, बाटा,
सब टपराणा छन,
तुमारी जग्वाळ मा,
प्यारा गढ़वाळ मा......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू, दिनांक 2/11/2016,
रचना संख्या-1030

ऊंचा हिंवाळा कांठा.....



देख्दा होला तुम,
जख डाळा नि जम्दा,
घास पात भी ना,
जम्दु छ त ह्युं,
जू सुखिलु होन्दु,
तोमड़ा का फूल की तरौं....

ह्युं जब गळ्दु छ,
तब जल्म होन्दु,
एक धौळि कू,
अर बग्दि छ,
ह्युंचळा कांठौं बिटि,
गैरी घाट्यौं की तरफ,
जीवनदायिनी बणिक.....

ऊंचा हिंवाळा कांठा,
लग्दा छन जन,
ऊंका मन मा,
आगास लौंफ्यौंण की,
खास आस छ,
अनंत छ आगास,
पर हिंवाळा कांठा,
पौंछि नि सक्दा,
आगास का पास.....

मनखि सीख ली सकदन,
ऊंचा हिंवाळा कांठौं सी,
बड़ु मनखि बण्न का खातिर,
पर मन नि बदल्युं चैंदु,
किलैकि माटु छ मनखि,
अपणौ तैं गौळा लगावा,
प्यार पिरेम बढ़वा,
यख सदानि कैन नि रौण....
दिनांक 4/11/2016

मलेेथा की कूल