Thursday, February 14, 2019

उत्तराखण्डी ई मैगजीन मा प्रकाशित म्येरी कविता


व्यंग बाण

जब चल्दा छन,
बिना चुब्याँ चुब्दा छन,
अर घैल भि  करदा छन,
यीं धर्ति मा मनख्यौं सनै.
जब छ्वड़दु  क्वी,
अपणा मुखार बिन्द बिटि,
कैका खातिर यनु स्वचिक,
कनि बितलि वेका मन मा,
अर तब होलु खुश मैं,
छक्किक अपणा मन मा.
सुदि नि चैन्दा छोड़्यां,
कै फर "व्यंग बाण",
एक दिन यीं धर्ति बिटि,
सब्बि धाणि छ्वड़ि छाड़ी,
हम्न तुम्न चलि जाण।


 लठग्युं  ब्वडा खल्याण मा,
हबरि देखणु  ढंग डौळ,
बल सैडि कुटम्बदारी का,
खेती पाती फर ध्यान निछ,
लगिं  नया जमाना की बौळ,
भला लगणा छन सब्यौं तैं,
नया जमाना का रंग अर थौळ.
ब्वारि घास काटण ,
नि छन मन सी राजि,
मोबैल धरयां छन हाथ मा,
बणि छन बिल्कुल निकाजि.
नौना निछन लगौणा मन, 
खेती पाती अर धाण मा, 
खुश छन गौं छ्वड़िक दूर,
घौर सी परदेस जाण मा.
ढंग डौळ द्येखिक परिवार का,
ब्वडा खल्याण मा पड़युं "लमतम",
स्वचणु अपणा मन मा ख्वैक,
क्या होलु परमात्मा कसम?
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016

http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/2016/12/jagmohan-singh-jayara-famous-internet.html

Friday, February 8, 2019

मुझे सरकार बनानी है....

राजनीति में बूढ़े नेता,

एक बड़ी नादानी है,

वोट मुझे ही देना वोटर,

मुझे सरकार बनानी है


मंदिर वहीं बनेगा मित्रों,

कोर्ट का निर्णय आने दो,

थोड़ा धैर्य और रखो,

मुझे सरकार बनाने दो।


अच्छे दिन दिखाए थे,

चल रही कहानी है,

धैर्य रखो प्यारे मित्रों,

मुझे सरकार बनानी है


चीन को चिढ़ाया मैंने,

पाकिस्तान पानी-पानी है,

देश का मान बढ़ाया,

मुझे सरकार बनानी है।

 
विपक्ष बहुत डरा हुआ है,

मेरी सरकार आनी है,

एक मौका और दे दो,

नहीं तो बड़ी नादानी है।
 

खाया नहीं न खाने दूंगा,

स्वच्छ सरकार चलानी है,

जनता तेरी जय हो,

मुझे सरकार बनानी है।
 

जन सेवक हूँ, सुनो हे! मित्रों,

मुझे सरकार बनानी है,

ठग बंधन से दूर रहना,

ये एक नयी कहानी है।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू , 6/6/2019
मई.2019 में होने वाले चुनाव के संदर्भ में रचियत मेरी कविता।
 

कवि धर्म निभाना है......


अक्सर मुझे,

कवि सम्मेलन में,

बुलाया नहीं जाता,

अगर कहीं बुला लिया,

दूसरे दिन फेसबुक पर,

मेरा फोटो नहीं आता।


पूछती है पत्नी मुझ से,

कवि सम्मेलन में जाने का,

मुझे सबूत दिखालाओ,

कल हुआ जो कवि सम्मेलन,

फेसबुक पर छपी अपनी,

एक भी फोटो दिखलाओ।


श्रोताओं आप मुझ पर,

कृपा इतनी कर देना,

कोई शिकायत नहीं आपसे,

मेरी फोटो ले लेना।

 
हो सके तो फेसबुक पर,

फोटो मेरी डाल देना,

कविमन की व्यथा समझकर,

लाज मेरी बचा लेना।


ध्यान रखना कवि मित्रों,

फेसबुक का जमाना है,

शक तो करेगीं पत्नियां,

कवि धर्म निभाना है......


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,  5/2/2019
हिमवन्त, चन्द्रकुंवर बर्त्वाल स्मृति मंच द्वारा दिनांक 10/2/2019 को आयोजित कवि सम्मेलन हेतु रचित मेरी यह कविता।

Wednesday, January 30, 2019

प्यार से कहती हूं....


 
एक औरत का चिल्लाना,

गधा ध्यान से सुन रहा था,

वो पति को कह रही थी,
कैसे गधे हो तुम?

चाय बेचने वाला,
प्रधानमंत्री बन गया,
बूटी बेचने वाला बाबा,
करोड़पति बन गया,
तुमसे तो वो अच्छे हैं,
कैसे गधे हो तुम?
 

पति प्यार से मुस्कराया,
मुझे गधा क्यों कह रही हो,
कोई गधा सुन लेगा तो,
उसकी बहन बन रही हो। 

गधा संवाद सुनकर, औरत के पास आया,
बोला, बहन आपका पति है इन्सान,
आपके लिए है भगवान,
आप गधा क्यों बोल रही थी?
खड़े हो गए मेरे कान।


औरत गधे पर चिल्लाई,
भाग जा यहां से,
इसी में है तेरी भलाई,
बहन कहते हुए मुझे,
तुझे शरम नहीं आई।


तुझ गधे की बहन,
मैं कैसे हो सकती हूं,
मैं तो प्यार से पति को,
गधा कहती हूं।



जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
30/01/2019

Friday, January 25, 2019

अलकनन्दा....



जीवनदायिनी अलकनन्दा,
अल्कापुरी से आती है,
निर्मल है जल जिसका,
किनारों से टकाराती है।
चार प्रयाग में चार नदियां,
अलकनन्दा में समाती हैं,
हो जाती हैं अस्तित्वहीन,
अलकनन्दा का बहाव बढ़ाती हैं।
सागर मिलन की आस में,
अलकनन्दा आतुर हो जाती है,
पथ पर आते जो भी पत्थर,
ओट में उनसे बतियाती है।
कल-कल बहती पथ पर अपने
देवप्रयाग तक आती है,

भागीरथी से मिलन करके,
फिर गंगा कहलाती है....
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
25/01/25/01/2019


मलेेथा की कूल