Wednesday, October 30, 2019

बग्वाळ की जग्वाळ...


मन मा ऊलार ल्हौन्दि छ,
जब औन्दि छ बग्वाळ,
नौना-बाळा, बेटी-ब्वारि,
साल भर करदा जग्वाळ।

जब जब औन्दि पाड़ मा,
बसगाळा बाद बग्वाळि,
खुश होन्दा सब्बि मनखि,
बणौन्दा पकोड़ी स्वाळि।

पुराणा जमाना मा जै दिन,
होन्दि थै बग्वाळ,
ब्वल्दा था दाना-सयाणा,
खूब खवा बग्वाळ।

बग्वाळ कु मतलब होन्दु,
जै दिन बण्दा भला पक्वान,
गेर भरी खान्दा सब्बि,
गरीब हो या धनवान।

आज का जमाना मा,
सदानि छ बग्वाळ,
हमारा पाड़ मा रन्दि थै,
बग्वाळ की जग्वाळ।

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
17/10/2019

Wednesday, August 7, 2019

डाळि लगावा....

बरखा कु पाणी बगण ने देवा,
खाळ बणैक जमा करा,
मिलि जुलिक डाळि लगावा,
डांडा ह्वे जाला हरा भरा....

बण कु बिकास ह्वे जालु जब,
धर्ति मा फुटला पाणी का धारा,
पाणी होलु त खेती भि होलि,
होणी खाणी होलि मुल्क हमारा...

जल्म हमारु यीं धर्ति मा,
धर्ति मां कु श्रृंगार करा,
मिलि जुलिक डाळि लगावा,
डांडा ह्वे जाला हरा भरा....

पित्रुन पाळ्यन डाळा बुटळा,
सबक ल्हीक श्रृंगार करा,
मिलि जुलिक डाळि लगावा,
डांडा ह्वे जाला हरा भरा....

बांज बुरांस की डाळि रोपा,
तन मन सी श्रृंगार करा,
मिलि जुलिक डाळि लगावा,
डांडा ह्वे जाला हरा भरा....

 वेद पुराण बतौन्दा छन,
एक डाळि दस पुत्र समान,
धर्ति मा डाळि लगौन्दु जू मनखि,
वे सी खुश होन्दा भगवान....

डाळि लगावा काम भलु छ,
कवि जिज्ञासूकी सुणा जरा,
मिलि जुलिक डाळि लगावा,
डांडा ह्वे जाला हरा भरा....

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
ग्राम: नौसा बागी, पट्टी: चंद्रवदनी,
पोस्ट औफिस: कुन्डड़ी,                   
टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।
दूरभाष: 9654972366
प्रवास: दर्द भरी दिल्ली।
01/07/2019

Thursday, February 14, 2019

उत्तराखण्डी ई मैगजीन मा प्रकाशित म्येरी कविता


व्यंग बाण

जब चल्दा छन,
बिना चुब्याँ चुब्दा छन,
अर घैल भि  करदा छन,
यीं धर्ति मा मनख्यौं सनै.
जब छ्वड़दु  क्वी,
अपणा मुखार बिन्द बिटि,
कैका खातिर यनु स्वचिक,
कनि बितलि वेका मन मा,
अर तब होलु खुश मैं,
छक्किक अपणा मन मा.
सुदि नि चैन्दा छोड़्यां,
कै फर "व्यंग बाण",
एक दिन यीं धर्ति बिटि,
सब्बि धाणि छ्वड़ि छाड़ी,
हम्न तुम्न चलि जाण।


 लठग्युं  ब्वडा खल्याण मा,
हबरि देखणु  ढंग डौळ,
बल सैडि कुटम्बदारी का,
खेती पाती फर ध्यान निछ,
लगिं  नया जमाना की बौळ,
भला लगणा छन सब्यौं तैं,
नया जमाना का रंग अर थौळ.
ब्वारि घास काटण ,
नि छन मन सी राजि,
मोबैल धरयां छन हाथ मा,
बणि छन बिल्कुल निकाजि.
नौना निछन लगौणा मन, 
खेती पाती अर धाण मा, 
खुश छन गौं छ्वड़िक दूर,
घौर सी परदेस जाण मा.
ढंग डौळ द्येखिक परिवार का,
ब्वडा खल्याण मा पड़युं "लमतम",
स्वचणु अपणा मन मा ख्वैक,
क्या होलु परमात्मा कसम?
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016

http://e-magazineofuttarakhand.blogspot.com/2016/12/jagmohan-singh-jayara-famous-internet.html

Friday, February 8, 2019

मुझे सरकार बनानी है....

राजनीति में बूढ़े नेता,

एक बड़ी नादानी है,

वोट मुझे ही देना वोटर,

मुझे सरकार बनानी है


मंदिर वहीं बनेगा मित्रों,

कोर्ट का निर्णय आने दो,

थोड़ा धैर्य और रखो,

मुझे सरकार बनाने दो।


अच्छे दिन दिखाए थे,

चल रही कहानी है,

धैर्य रखो प्यारे मित्रों,

मुझे सरकार बनानी है


चीन को चिढ़ाया मैंने,

पाकिस्तान पानी-पानी है,

देश का मान बढ़ाया,

मुझे सरकार बनानी है।

 
विपक्ष बहुत डरा हुआ है,

मेरी सरकार आनी है,

एक मौका और दे दो,

नहीं तो बड़ी नादानी है।
 

खाया नहीं न खाने दूंगा,

स्वच्छ सरकार चलानी है,

जनता तेरी जय हो,

मुझे सरकार बनानी है।
 

जन सेवक हूँ, सुनो हे! मित्रों,

मुझे सरकार बनानी है,

ठग बंधन से दूर रहना,

ये एक नयी कहानी है।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू , 6/6/2019
मई.2019 में होने वाले चुनाव के संदर्भ में रचियत मेरी कविता।
 

कवि धर्म निभाना है......


अक्सर मुझे,

कवि सम्मेलन में,

बुलाया नहीं जाता,

अगर कहीं बुला लिया,

दूसरे दिन फेसबुक पर,

मेरा फोटो नहीं आता।


पूछती है पत्नी मुझ से,

कवि सम्मेलन में जाने का,

मुझे सबूत दिखालाओ,

कल हुआ जो कवि सम्मेलन,

फेसबुक पर छपी अपनी,

एक भी फोटो दिखलाओ।


श्रोताओं आप मुझ पर,

कृपा इतनी कर देना,

कोई शिकायत नहीं आपसे,

मेरी फोटो ले लेना।

 
हो सके तो फेसबुक पर,

फोटो मेरी डाल देना,

कविमन की व्यथा समझकर,

लाज मेरी बचा लेना।


ध्यान रखना कवि मित्रों,

फेसबुक का जमाना है,

शक तो करेगीं पत्नियां,

कवि धर्म निभाना है......


जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू,  5/2/2019
हिमवन्त, चन्द्रकुंवर बर्त्वाल स्मृति मंच द्वारा दिनांक 10/2/2019 को आयोजित कवि सम्मेलन हेतु रचित मेरी यह कविता।

मलेेथा की कूल