Monday, December 16, 2019

"यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड-२०१०"



जब-जब होलु जिक्र,
कब ह्वै थै अर कैन करि?
"उत्तराखंड सिने अवार्ड" की,
एक अनोखी शुरुआत.

लिख्यालि स्वर्णाक्षर मा,
अर दर्ज कार्यालि,
इतिहास का पन्ना फर,
९-मई, २०१०,
"यंग उत्तराखण्डन" अपणु नौं.

उत्तराखण्ड सिने जगतन,
करि प्रगट अपणु आभार,
या शुरुआत छ भलि,
होलु हौर सुन्दर प्रयास प्रसार.

जुग जुग राजि रै,
"यंग उत्तराखण्ड संगठन"
सार्थक छ आपकु,
पैलु भागीरथ प्रयास,
करदु रला आप,
उत्तराखण्ड कू सृंगार,
समाज का सर्वहित मा,
सब्यौं की छ या आस.

आयोजन मंच सी दिनि,
सब्बि महान लोगुन सन्देश,
बोली भाषा कू सम्मान करा,
रलु कायम अस्तित्व हमारू,
समृद्ध होलु हमारू उत्तराखण्ड प्रदेश.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड-२०१०")
(यंग उत्तराखण्ड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित १०.५.२०१०)

"बास हे घुग्ति"



बास हे घुग्ति, डाळ्यौं मा बैठि,
मैनि लगिं छ चैत की,
ऐगि  मौळ्यार, सजि धजिं छन,
डांडी मेरा मैत की.......

पाख्यौं  मा फ्यौंलि, मुल-मुल हैंसणि,
सारी मेरा मैत की,
तेरु बासणु, कनु भलु लगणु,
फूल्यारि मैनि चैत की......

अबरि अयुं छौं, मैत मैं अपणा,
खुद नि लगणि मैत की,
बास बास तू, प्यारी हे घुग्ति,
रौंत्याळि  मैनि चैत की......

स्वाळि पकोड़ी,  खाणु छौं घुग्ति,
थगोलि दाळ भात की,
कथगा सवादि, लग्दि छन
लगड़ी ब्वै  का हात की.....

मैत मा अपणा, दगड़्यौं दगड़ि,
सुण हे  घुग्ति मैत की,
कथगा ऊलार, रीत रसाण,
ऊलारया मैनि मैत की.....

"बास हे घुग्ति", डाळ्यौं मा बैठि,
बोन्नि  बैठिं पास,
कवि "जिज्ञासु", दूर प्रदेश,
होयुं छ ऊदास.........

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"बास हे घुग्ति" प्रकाशित यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर १३.४.२०१०)

"पानी रे! पानी"



तेरी कदर किसी ने न जानी,
जब नहीं मिलता है,
दुनियाँ हो जाती दीवानी,
अपने शहर में देखता हूँ,
बर्तन लेकर भागते लोग,
पानी की खोज में,
कहाँ मिलेगा?
प्यास बुझाने के लिए,
अनमोल पानी.

जल को बचाते थे लोग,
परम्परा है पुरानी,
कहते हैं  आज मानव सभ्य है,
पीने लगा बोतल बन्द पानी,
ये विकल्प नहीं कालजयी,
भाग रहा दूर जिम्मेदारी से,
कर रहा है नादानी.

पहाड़ दम तोड़ रहा है,
जहाँ से निकलता है,
नदियों  के नीर के रूप में,
पवित्र गंगा, यमुना का पानी,
लील रहा मानव प्रकृति को,
मित्रता नहीं रखता उससे,
कर रहा कैसी नादानी.

हिमालय के आंसू निकल रहे,
मत समझना उसे पानी,
पिघल चुका है दिल उसका,
हो रहा बर्फ विहीन,
ऐ मानव!
प्रकृति का मिजाज बदला,
तेरी ही है मेहरबानी,
कवि "जिज्ञासु" की कल्पना नहीं,
ये आईना है सच्चाई का,
 "पानी रे! पानी",
तेरा हाल ऐसा क्योँ हुआ?

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित "पानी रे! पानी" ३०.४.२०१०)
दूरभास: ०९८६८७९५१८७
(प्रकाशित: यंग उत्तराखंड पोर्टल, मेरा पहाड़ पर)   

"फुन्ड धोळ्युं"



बोल्दा छन मेरा मुल्क का मनखि,
सीधा साधा निमाणा मनखि कू,
किलैकि ऊ कैकि जड़ नि काटदु,
कैका होण फर, अगनै बढण फर,
अपणा मन मा कब्बि  नि जल्दु,
ह्वै सकु  त सब्यौं की मदद करदु.

यनु भी  बोल्दा छन,
अरे! ऊत  गोरु सी कुर्च्युं,
"फुन्ड धोळ्युं" मनखि छ,
जै सनै चर्क न फर्क,
दुनियाँदारी क्या होन्दि.

"फुन्ड धोळ्युं" ऊ होन्दु छ,
जू कैकि जड़ काट करिक,
सारु पन्त मारदु अर  खोन्दु छ,
जब तक नि करलु उल्टा काम,
खयुं पेट मा हजम नि होन्दु छ.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-  "फुन्ड धोळ्युं" नि छौं  २७.४.२०१०) 

"झबर्ताळ"





धरि थै गल्वाड़ा फर,
बचपन मा बुबाजिन,
ममतामयी माँ जिन,
स्कूल मा मास्टर जिन,
गौं का सयाणा मन्खिन,
ऊछाद, गल्ती कन्न फर.

आज जमानु यनु निछ,
अजग्याल का छोरों देखिक,
ब्वे, बाब,मास्टर जी,
गौं का सयाणा मन्खि,
भौत डरदा  छन अफुमा,
इज्जत का खातिर,
चुप रण मा ही भल्यारि,
समझदा छन सब्बि.

"झबर्ताळ" लगण फर,
होन्दु थौ अहसास,
अपणी भूल या गल्ती कू,
भूलिक  करदा था भलु काम,
अपणी जिंदगी का खातिर,
हिट्दा था सुबाटा फुन्ड,
क्वी ठटा  न लगौ हमारी.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"झबर्ताळ" नि लगैन २७.४.२०१०) 

Tuesday, December 10, 2019

पतरोळ

उत्तराखण्डा ऊंचा डांडौं मा हरा भरा बण सब जगा छन। 1985 सी पैलि बेटी ब्वार्यौं तैं घास लाखड़ु का खातिर युं बणु मा जाण पड़दु थौ।  हर चौक मा भैंसा बल्द बध्यां रन्दा था। गौं की सार्यौं मा घास लाखड़ु की कमी होण का कारण ऊंचा डांडौं फर गौं का लोग निर्भर रन्दा था। बेटी ब्वारि जब बण जान्दि त पतरोळ की भारी डौर रन्दि थै।  पतरोळ जूड़ी दाथड़ि लूछि देन्दा था अर बण औण कु मना करदा था।  घसेर्रयौं का सामणि भारी आफत पैदा ह्वे जान्दि थै।  एक तरफ सैसर्यौं की डौर अर दूसरी तरफ पतरोळ की। 

1906 मा राजशाही का दौरान वन अधिकारी सदानन्द गैरोळा न चन्द्रवदनी, टिहरी क्षेत्र की मुनार बन्दी करवै थै। उबरि खासपट्टी का लोगुन बण फर अपणा हक्क का खातिर ढ़ंढ़क आन्दोलन करिक अपणु विरोध जताई थौ।  मुनारबन्दी सी पैलि लोग बण बिटि बेरोक टोक घास लाखड़ा ल्हौन्दा था।  जब बण मा बणांग लग्दि थै त सब्बि गौं का लोग आग बुझौण जान्दा था। मुनारबन्दी का बाद गौं का लोग्वा मन मा या बात आई, अब्त बण सरकारी छन। आग बुझौण की जिम्मेदारी सरकार की हिछ।  बणु की जग्वाळ का खातिर सरकार न पतरोळ नियुक्त कर्यन अर गौं का लोगु तैं बण बिटि घास लाखड़ु ल्हौण की मनाही ह्वेगि।

पतरोळ की व्यथा या होन्दि थै, जु घसेन्यौं फर दया करदु त नौकरी खतरा मा। साब सुण्लु त नौकरी चलि जालि अर नौकरी जालि त, बाल बच्चौं न तब क्या खाण? एक पतरोळ मूं लगभग बीस वर्ग किलोमीटर कु क्षेत्र होन्दु।  यथ्गा बड़ा क्षेत्रफल का बण की रख्वाळि कन्नु भि औखु काम होन्दु। पतरोळ नि दिखेन्दु त घसेरी तबर्यौं बांजै डाळि काटिक काम तमाम करि देन्दि थै। हौळ लगौण कु नसुड़ा का खातिर लोग बांजौ डाळु रड़कै देन्दा था।  जब पतरोळ वे क्षेत्र मा औन्दु त देख्दु, बांजै डाळि काटि कूटिक काम तमाम करयुं छ।  

पाडैं बेटी ब्वार्यौं कु बण जाणु जरुरी होन्दु थौ।  सुबेर राति उठिक सब्बि बेटी ब्वारि कै मैल ऊकाळ हिटिक बण पौंछ्दि थै।  बाल बच्चौं सी ज्यादा गोरु भैंसौं की फिकर होन्दि थै।  बण बिटि घास ल्हौणु, गोर भैंसा पिजौणु, चूल्लू जगैक खाणौ बणौणु, बाल बच्चौं तैं खलौणु पिलौणु, थकि हारिक से जाणु, या थै पाड़ै बेटी ब्वार्यौं की जिंदगी।    
पतरोळ जाण्दु थौ, पाड़ की बेटी ब्वार्यौं कु बण हि सारु छ।  एक गौं की घसेरी न सुबेर बण जान्दि बग्त अंधेरा मा कोदा की रोठ्ठी समझिक रोठ्ठी बणौण कु तौ चादरि फर लिब्टैक धरि।  बण मा घास काटण का बाद दिन मा सब्यौंन अपणि रोठ्ठी खोल्यन त वीं घसेरिन देखि,  वींकु रोठ्ठी की जगा तौ ल्हयुं छ। 

पाड़ की बेटी ब्वार्यौं तैं काम की भारी राड़ धाड़ रन्दि थै। कुपोषण का कारण उम्र सी बड़ी लग्दि थै बेटी ब्वारी।  पति परदेस रन्दा था, बाल बच्चौं की रेख देख, धन, चैन, खेती बाड़ी का काम मा जिंदगी कटेन्दि थै। तबरि तौंकी जिंदगी पाड़ जनि औखि थै।  1985 का बाद बग्त बदलि, बेटी ब्वार्यौं की जिंदगी मा कुछ बदलौ आई।  पर्वासी अपणा परिवार तैं दगड़ा ल्हिग्यन अर पाड़ खाली होण लगि।  पाड़ मा रैग्यन सिर्फ बुढ़्या ब्वे बाब।  पाड़ मा पलायन पसरी अर गौं मा वा रौनक अब नि रैगि।

पाड़ मा आज सब सुविधा छन।  बण आज क्वी घसेरी नि जान्दि ।  बण यथ्गा घणा ह्वेग्यन, अब वख बाग रीक्क की भारी डौर छ।  पतरोळ बेफिक्र छन किलैकि अब बण मा मनख्यौं कु जाणु बिल्कुल बन्द ह्वेगि।  गौं गौं मा आज घास लाखड़ु भौत छ।  धन चैन कै भि चौक मा अब नामात्र का छन।   पुंगड़ा बंजेणा छन अर वख बान्दर सुंगर मौज मनौणा छन।  दूरदर्शन फर एक दिन पाड़ फर डौक्युमेन्टरी प्रसारित होणी थै।  मैंन धर्मपत्नी कु ब्वलि, देख हमारु पाड़ क्थ्गा रौंत्याळु छ।  धर्मपत्नी न ब्वलि, “पाड़ पिक्चर मा हि सुन्दर लग्दु, पाड़ की जिन्दगी हमारा खातिर कतै भलि नि थै।”

पतरोळ पाड़ की घसेरियौं का खातिर एक खलनायक थौ।  बण घसेरियौं का मैत था।  चिपको आन्दोलन की महिला कार्यकर्ताओं न भी बण तैं अपणु मैत बताई।  जब जब सरकान न बण काटण का ठेका दिनिन्यन त महिलाओं न बढ़ि चढ़िक बण बचौण का खातिर आन्दोलन करिक अपणा बण बचैन। घसेरी अर पतरोळ का बीच द्वन्द फर गीताकारु न गीत बणैन अर गीत मा पाड़ की घसेरियौं की व्यथा भि बताई।  बग्त बदलि अर घसेरियौं की औखि जिंदगी भि।  पाड़ पलायन सी आज घैल छ।   पाड़ पिरेमि आज पलायन की बात करदन।  असंभव लगणु छ, जब तक पाड़ मा रोजगार, शिक्षा अर स्वास्थ्य की भलि व्यवस्था नि ह्वलि, पाड़ दिन दिन पलायन सी त्रस्त ह्वन्दु जालु।

पतरोळ अर घसेरी कु युग अब अतीत मा समैगि।  घसेरियौं की वा पिड़ा अब हमारा पाड़ मा निछ।  हमारी नयी पीढ़ी अब पतरोळ का बारा मा कुछ नि जाण्दि।  कखि लेख कथाओं मा हि घसेरी अर पतरोळ बारा मा पढ़लि।  घसेरियौं की वे बग्त की पीढ़ी आज प्रवास मा सुखी जिंदगी बितौणि छ।  जब जब वे बग्त की बात ऊंका मन मा आलि, तब की जिंदगी अर पिड़ा उभरिक मन मा जरुर आलि। 


जगमोहन सिंह जयाड़ा “जिज्ञासू”
दर्द भरी दिल्ली प्रवास बिटि,
दूरभाष: 9654972366
दिनांक 08/12/2019 
कुमगढ़ पत्रिका के लिए रचित 

"माधो सिंह "काळू" भंडारी"

















आमू का बागवान मलेथा, लसण प्याज की क्यारी,
कूल बणैक अमर ह्वैगि, वीर माधो सिंह भंडारी.

बुबाजी भड़ सोंणबाण "काळू" भंडारी, ब्वै थै देवी भाग्यवान,
कथ्गा प्यारु तेरु मलेथा, माधो जख केळौं का बगवान.

दगड़्या थौ चम्पु हुड्क्या, देवी जनि उदिना थै कुटमदारी,
नौनु प्यारु गजे सिंह, जू छेंडा मूं कूल का खातिर मारी.

बांजा पुंगड़ौं अन्न निहोन्दु, पेण कु निथौ बल पाणी,
उदिना बोदि माधो जी कू, मेरा मलेथा ल्य्हवा पाणी.

दिनभर निर्पाणि का पुंगड़ौं, करदा छौं हम धाण,
भात खाण की टरकणी छन, मेरी बात लेवा माण.

मलेथा की की तीस बुझौलु, ल्ह्योलु अपणा मलेथा मां पाणी,
निहोंणु ऊदास प्यारी ऊदिना, दूर होलि हमारा गौं की गाणी.

चंद्रभागा गाड बिटि कूल बणायी, कोरी मलेथा मूं छेंडू,
पाणी छेंडा पार नि पौंछि, माधो सिंह चिंता मां नि सेंदु.

भगवती राजराजेश्वरी रात मां, माधो सिंह का सुपिना आई,
कूल कू पाणी पार ह्वै जालु, मन्खि की बलि देण का बाद बताई.

मलेथा की कूल का खातिर, माधो सिंह न करि गजे सिंह कू बलिदान,
गजे सिंह का दुःख मां रोन्दि बिब्लान्दि, ब्वै ऊदिना ह्वैगि बोळ्या का समान.

ऊदिना न तै दिन दुःख मां ख्वैक, दिनि थौ बल मलेथा मां श्राप,
ये वंश मां क्वी भड़ अब पैदा नि ह्वान, जौन गजे सिंह मारि करि पाप। 

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

8/11/2011

मलेेथा की कूल