(जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" १.६.२०११ )
पैदा होन्दु ही मैंन देखि, पर उबरी नि बिंग्यौं,
क्यौकु छन यथगा बड़ा, आसमान छुणौकु होयाँ खड़ा,
दादा-दादी, ब्वै-बाब की, खुग्लि मा बैठि-बैठि हेरी,
उबरी मासूम बाळुपन, अर उम्र कच्ची थै सच मा मेरी,
आज सोचदु छौं मैं, पहाड़ सी मैंन क्या क्या सीखी?
बड़ु दिल, धैर्य, शालीनता, जीवन मा ऊंचा उठण की तमन्ना,
घमंड न हो मन मा, कैकु दिल न दुखौं जाणिक कभी....
समझदार होण फर मैंन पूछि, हे पहाड़! क्या देखि त्वैन?
अतीत सी मेरी जन्मभूमि मा, क्या माधो सिंह भंडारी जी भि,
गबर सिंह, चन्दर सिंह, दर्मियान सिंह, तीलु, अर सब्बि वीर भड़,
हे "पहाड़" तू जुगराजि रै, अर जन्म लेलि हमारी अगली पीढ़ी,
तेरी गोद मा, हैंसली खेललि, या मैं जगमोहन सिंह जयाड़ा,
गढ़वाळि कवि "जिज्ञासु" का मन की आस छ...
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