(द्वारा/रचित/ जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" )
कदम कदम फर अपणा ही,
आज दुखदाई छन,
देखदु छौं जब मिजाज ऊँका,
खट्टु सी ह्वै जान्दु मन...
द्वी कदम मेरी तरक्की का,
मन मा ऊँका आग,
कैका भाग कू क्वी नि खांदु,
अपणु-अपणु भाग.....
बात सिर्फ हृदय किछ,
जख बस्दु छ भगवान,
बेदर्द किलै होयां अपणा,
जन ढुंगा का समान....
फिर भि दिल मा दर्द छ,
जना भि छन ऊँका मिजाज,
देखि दुनियां मतलबी छ,
पराया ही "अपणा आज"...
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित ३०.८.२०११)
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