फल फूल रहा है अपने भारत में,
जिसका बढ़ रहा है दिनों दिन आकार,
कुछ भ्रष्टाचारी जेल में हैं आजकल,
सुनते होंगे आप उनके समाचार.....
अपने देश में आखिर,
अन्ना जी ने भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध,
अलख है जगाई,
जन जन के मन में,
भ्रष्टाचार के विरुद्ध, चेतना है आई,
पर प्रश्न अभी भी सामने है?
क्या खत्म हो पाएगा भ्रष्ट्राचार,
कुछ तो चाहते हैं, रहे ये सदाबहार....
पग पग पर खड़े हैं आज,
भ्रष्ट्राचार समर्थक दलाल,
जनता क्या करे,
कोई काम करवाना हो,
हो जाते हैं उनके हाथों हलाल,
ताल ठोककर कहते हैं वे,
क्या तुम्हें अपना काम,
नहीं है करवाना,
लगाते रहो चक्कर यहाँ के,
तुम्हें ज्यादा क्या है समझाना.
कामना है कविमन की,
हे भ्रष्टाचार तुम अंग्रेजों की तरह,
हमारे भारत को छोड़ो,
युगों युगों से महान है देश हमारा,
गांधी जी का देश है भारत,
हे भ्रष्टाचारियौं ये कुकृत्य,
सदा सदा के लिए छोड़ो.
स्वरचित: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २२.९.२०११)
भ्रष्टाचार पर एक बेहतरीन कविता. भ्रष्टाचार आज एक विकराल समस्या है. रावण को लंका से उखाड़ने के लिए श्री राम को चौदह वर्ष लग गए थे. तो फिर यह दैत्य क्या इतनी सरलता से भाग जायेगा. लम्बी लड़ाई है और बहुत समय चाहिए... किसी को यह कह दो कि चाय पीना छोड़ दो तो उसे चाय छोड़ने में समय लग जायेगा. ऐसे ही किसी को यह कहोगे कि "लेन देन" छोड़ दो तो क्या वह एक ही झटके में ही छोड़ देगा. नहीं ना. बहरहाल!
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर आपने ज्वाइन नहीं किया है. भाई ज्वाइन करो ना. तभी तो पुल बना रहेगा भावनाओं का संवाद बनाये रखने के लिए.
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