Sunday, April 7, 2013

"हला छोरा"

ऊंड बजौ तैं बाँसुळ,
देख ऊलारया मैनु लग्युं छ,
हमारा मुल्क मौळयार छयुं छ,
कुछ दिन मा कौथिग आला,
चल हे दगड़या!माल्डा का मेला,
गौं  का बाटा फुंड हिट्दु,
हमारा गौं का कौथगेर,
धै लगाला अर भट्याला....

आज मेरु मन अल्सेयुं छ,
कुजाणि क्यौकु ऊदास होयुं छ,
मन मा सेळी सी पड़लि तब,
दादु मेरी ज्युकड़ी ऊलारया छ,
मैं पहाड़ कू पोथलु,
बुरांश कू रसिया,
हिल्वांसि मन छ मेरु,
ऊंड बजौ तैं बाँसुळ,
मेरु ज्यु पराण खुदेयुं छ....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षति
7.4.13







 

Saturday, April 6, 2013

"लगोठ्या कख भागी"

असन्द बितिं छ ब्याळी बिटि,
बोडा बबड़ाट कन्नु छ,
हे बेटौं वे खोजिक ल्ह्यावा,
ज्यू पराण छ मेरु,
नितर मैन मरि जाण,
वैका बिना झट्ट पट्ट,
सच छौं बोन्नु तुमारा सौं.....

मरदि बग्त तुमारा दादाजिन,
दिनि थौ मैकु ऊ लगोठ्या,
यनु बोलिक जेठ्वाळी छ या,
सैंति समालिक़ रखि,
तेरि दादी तैं दैजा मिलिं,
तीलु बाखरी की निसाणि छ,
पर आज कनु अभाग आई,
"लगोठ्या कख भागी",
खोजा दौं हे! लाठ्यालौं.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित 6.4.2013

स्वप्न में.....



जनता की इच्छा से मैं,
उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बन गया,
कैसे हुआ ये? माथा मेरा ठन गया,
मैं नहीं बनना चाहता प्रिय जनता,
मैंने जनता को बताई लाचारी,
विकास हो उत्तराखंड का,
आपकी तरह ही है इच्छा हमारी...

मेरी अनिच्छा भांपकर,
कुछ कवि मित्र मेरे पास आए,
नतमष्तक हो समझाने लगे,
मौका हाथ से मत गंवाओ,
मौका मिला है जिंदगी में,
खाओ और कमाओ,
कवि सम्मलेन करवाओ....

रात खुल चुकी थी,
स्वप्न टूटा आँखे खुली,
सामने दीवार घड़ी नजर आई,
जय हो बद्रीविशाल जी,
मन से मैंने पुकार लगाई....

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा  "जिज्ञासु" 6.3.13
सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, April 5, 2013

"चलो, तुम्हें अपनी कलम से"


बिना देखे पहाड़ दिखाता हूँ,
उत्तराखंड के टिहरी जनपद,
देवप्रयाग विकास खंड में,
2756 मीटर की ऊँचाई पर,
चन्द्रबदनी एक सिद्धपीठ,
जहाँ आते हैं भक्त,
माँ भगवती के दर्शन के लिए,
जहाँ से दिखता है,
खूबसूरत उत्तराखंड हिमालय,
नई टिहरी, नई पौड़ी, खिर्शु,
दशरथांचल पर्वत,
उत्तर में खैंट पर्वत,
जहाँ अहसास होता है,
जैसे खड़ा हूँ खिले,
कमल के फूल के बीच में....


चन्द्रबदनी मंदिर में,
पहले भैंसे और बकरे की,
बलि देते थे लोग,
स्व स्वामी मन्मथन जी,
और स्थानीय जनता के,
भागीरथी प्रयास से,
1969 में ये प्रथा बंद हो गई,
सदा सदा के लिए....


देवी दर्शन के लिए,
चैत्र मास की अष्टमी को,
अगर आप चन्द्रबदनी जायेंगे,
खिले हुए लाल सुर्ख,
मनमोहक बुरांश के फूल,
आपका मन हर्षायेंगे,
मनोकामना भी पूर्ण होगी,
चन्द्रबदनी एक सिद्ध पीठ है....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित, प्रकाशित,
दिनांक: 5.4.2013



Thursday, April 4, 2013

"यादें बचपन की"


मन लगाकर पढता था,
पहाड़ की पठाळी से,
ढके हुए पारंपरिक घर की,
खूंटेलि में बैठकर,
जोनि के उजाले में,
तब पहाड़ में,
मिट्टी के तेल का दिया,
जलाते थे लोग,
बदचलन बिजली तब,
गाँव तक नहीं पंहुंची थी....


पिता जी पास ही बैठ,
हुक्का गुड़ गुड़ाते थे,
और छ्वीं लगाते थे,
रणु चाचा के साथ,
जब तमाखु ख़त्म हो जाता,
कहते थे पिता जी,
एक चिल्म और भर दे बेटा,
पढाई की तल्लीनता त्याग,
भरता था चिल्म,
रखता था अंगारे उस पर,
माँ कहती थी,
सारे अंगारे ले गया,
रोटी कैसे सेकूंगी.....

सामने के गाँव में,
एक दिन बाग आया,
जहाँ जोर जोर से,
भट्या रहे थे लोग,
बकरी ले गया है बाग़,
गाड की तरफ,
तब मैंने बाग़ को सामने,
आँखों से देखा नहीं था...

एक दिन गाँव के,
लोगों के साथ,
गया था लकड़ी के लिए,
हयुन्द के दिन थे,
अचानक पड़ने लगी बर्फ,
ठण्ड के मारे बुरा हाल,
गाँव की एक चाची,
सुझाव दे रही थी,
ठेणी से बचने के लिए,
पाँव में पेसाब करो....

भूतों की कहानी,
सुनता था सोते बग्त,
दादी जी से,
डर भी लगता था,
गाँव के एक बूढ़े ने,
रात में अपनी भैंस समझकर,
पकड़ ली थी पूँछ,
एक दैंत की,
जो घूमता था गाँव के,
चारों ओर और चला जाता,
गाँव के जंगल में.....


गाँव में बीता बचपन,
याद दिलाता है अतीत की,
शहर में कौन सोचता है,
"यादें बचपन की",
उभरती हैं मन में आज भी,
ये कवि "जिज्ञासु" की आदत समझो,
या एक प्रवासी पहाड़ी का मन....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षति
लोकरंग, दस्तक, पहाड़ी फोरम, मेरा पहाड़ फोरम, उत्तराखंडी लेखन प्रतिभा,
जयाड़ा बंधु एवं ब्लॉग पर प्रकशित
4.4.13

Tuesday, April 2, 2013

"एक दिन यनु भी आलु"

जिंदगी मा जेब भरदु भरदु,
एक दिन यनु आई,
सक्या समर्थ नि रै देह मा,
प्राण पोथ्लु सी ऊड़ि ग्याई,
कठ्ठा ह्वैन भला बुरा सब,
ऊन अर्थी हमारी सजाई,
कविताओं कू कायल मेरी,
एक प्यारू दगड़या आई,
सब्यौं कू बोलि वैन,
जरा कवि कू किस्सा टटोल़ा,
किस्सा फर कुछ नि मिलि,
होण लगि रौला धौला,
कैन बोलि क्या मिन्न थौ,
वैकु कविताओं कू लोभ थौ भारी,
पैंसा टक्का का फेर मा नि रै,
बस या हि थै वैकी लाचारी,
भलु भौत रै वैकी कविताओं सी,
लग्दि थै मन मा कुतग्याळी भारी,
आज चलिगी यीं धरती सी,
स्वर्ग मिल्यन हे बद्रीविशाल जी वैकु
आपसी सी अर्ज छ हमारी....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
3.4.2013

Monday, April 1, 2013

"मेरी लाचारी"



कख गैन मनखि,
घर बार त्यागि,
घर गौं हमारू टपराणु,
देळी मा बैठ्युं मंगतु बिचारू,
कख गैन दिदा आज ऊ दिन,
ऊदौळी ऊठणि मन मा वैका,
ऊदास ह्वैक बताणु...

मेरु भैजि परदेशी ह्वैगि,
घर गौं अब नि औन्दु,
मैकु भैजि की याद औन्दि,
मन अति ऊदास होंदु....

ब्वै बाब मेरा स्वर्गवासी,
भैजि फर हि थौ भारी सारू,
कखि मिललु बतैन वैकु,
दिदा तुम मेरी लाचारी...

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित ब्लॉग पर प्रकाशित,
1.4.2013 दूरभाष: 9654972366















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