Wednesday, January 27, 2021

ढुंगा

 


जब क्वी ब्वल्दु मनखि कु,

बल तू ढुंगू छैं,

सुणदन तब ढुंगा,

ह्वन्दा छन भारी नाराज,

तब ब्वल्दन,

ढुंगा मनख्यौं कु,

तुम छैं ढुंगा,

अर दुमुख्या मनखि।

 

सच मा ढुंगा द्यब्ता छन,

मूर्ति बणैक मंदिर मा,

पूजदन मनखि,

घर कूड़ा भि बणौंदन,

जख अपणु जीवन बितौन्दन,

मण्डाण मा ढुंगा बिछैक,

ऊंका ऐंच द्यब्ता नचौन्दन।

 

ढुंगा ब्वल्दन,

हम्न पाड़ नि त्यागि,

तुम मनखि यना छैं,

जख मिलि गळ्खि,

वे मुल्क देस भागी।


27/01/2021

 


सूर्योदय

 


ह्वन्दु छ जब पाड़ मा,

हिंवाळि कांठी,

सोना चान्दी सी चमकदिन,

अति स्वाणि लगदिन,

चौखम्बा, नन्दा घूंटी,पंचाचूली,

चौखम्बा अर त्रिशूली।

 

पर्वतजन सदा द्यखदन,

करदन भलु ऐसास,

जब औन्दन सूरज भगवान,

ऊंचि हिंवाळि कांठ्यौं बिटि,

देवभूमि उत्तराखण्ड लग्दि,

स्वर्ग का समान।

 

अंध्यारु मिटि जान्दु,

डांडी-कांठ्यौं मा ऐ जान्दु घाम,

ल्यन्दन मनखि सुबेर,

देवभूमि का द्यब्तौं कु नाम।

 

शुरु ह्वन्दु दिन,

करदन मनखि अपणि धाण,

सूरज भगवान चमकदन,

खुश ह्वन्दु ज्यू पराण।

 

सूर्योदय पाड़ मा,

लग्दु अति प्यारु,

मुल्क भि हमारु,

यीं दुन्यां मा अति न्यारु।

27/02/2021

 


धौळि बचावा

 


धौळ्यौं कु जल्म छ ह्वयुं,

हिमालयी ग्लेशियरों बिटि,

ब्वल्दन जौंकु सदानीरा,

सागर जथैं बग्दु जान्दिन,

टकरान्दिन अपणा किनारों सी।

 

धौळ्यौं का धोरा छन,

प्रसिद्ध पंच प्रयाग,

जख ब्याखुनि बग्त,

बजदन शंख अर घाण्ड,

जगदन झिलमिल द्यू।

 

धौळ्यौं का धोरा बस्यां छन,

सैर अर बजार,

जख बिटि निकळ्दु छ,

प्रदूषित पाणी,

गंदळि कर्याल्यन धौळि,

हे! मनख्यौं तुम्न,

धौळ्यौं की पवित्रता,

कतै नि पछाणि।

 

आज आवाज उठणि,

धौळ्यौं तैं बचावा,

पबित्रता खत्म न करा,

धौळ्यौं तैं न सतावा।


27/01/2021

पहाड़

 


मन तैं सकून देन्दन,

जौंका चरण मा बग्दिन,

पवित्र धौळि गंगा-जमुना,

च्वंट्यौं मा चमक्कदु,

सुखिलु चमकिलु ह्युं।

 

बदन मा जौंका धारण कर्यां,

हरा भरा बण,

पीठ फर जौंका झूमदन,

बांज, बुरांश अर देवदार।

 

बाटौं फुंड हिटदा बट्वै,

पौन्दन प्रकृति कु प्यार,

द्यखदन डांडी-कांठी,

मन मा पैदा ह्वन्दु उलार।

 

मनखि ब्वल्दन,

बल जिंदगी पहाड़ ह्वेगि,

पर पहाड़ अति प्यारा,

यीं दुन्यां मा अति न्यारा।

 

जुगराजि रै पहाड़,

त्वेन बीर भड़ द्येखि ह्वला,

आपकु रैबार हम्तैं,

उत्तराखण्ड की जै ब्वला।

27/01/2021


Thursday, November 12, 2020

हमारु उत्तराखण्ड


बीस बरस कु ज्वान ह्वेगि,

ब्वला त सयाणु ह्वेगि,

बिकास भि होण लग्युं,

पैलु जनु अब नि रैगि।

 

कर्णप्रयाग तक रेल जाणी,

ऊद बगणु अलकनंदौ पाणी,

आल वैदर रोड भि बण्नि,

यनु ह्वलु कैन नि जाणी।

 

रोजगार की आस जगणि,

पर्यटन बिकास होणु,

जतन कन्ना ज्वान सब्बि,

उत्तराखण्ड खुश होणु।

 

द्यख्दु जावा क्या क्या ह्वलु,

पर्यावरण भि बचौण पड़लु,

पाड़ घच्चोरी हरेक पाड़,

दु:खी ह्वेक ऊद भि रड़लु।

 

भाषा संस्कृति कायम रौ,

उत्तराखण्डै ज्व छ पछाण,

बांज बुरांसा बण प्यारा,

जख बस्दु हमारु पराण।

 

ज्यु पराण सी प्यारु छ,

हमारु रौंत्याळु उत्तराखण्ड,

श्रृंगार करा तन मन सी,

होण न द्यवा ऊत्ताणदंड।

 

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

13/11/2020


नाति....

 


 

क्या दिन क्या रात,

बग्त की छ बात,

नाति बिळम्युं मोबैल फर,

सुण्दु निछ बात।

 

स्मार्ट फोन चलौणु,

गीत कार्टून द्येखि,

भारी खुश होणु,

दादा द्येखि,

मुखड़ि छ लुकौणु ।

 

जबरि छंद औन्दु,

करदु नाति तैं पुळ्याट,

ब्वल्दु ल्हौ चीज मैकु,

मचौन्दु लराट ।

 

आंग्ळि घुमौन्दु फोन फर,

पढ़दु छ किताब,

अंग्रेजी मा पुछ्दु मैकु,

दी नि सक्दु जबाब ।

 

कख गै ऊ जमानु,

सुण्दा था टक्क लगैक,

दादा जी की बात,

कथा सुणि दादा जी सी,

कटदि थै ह्युंदै रात ।

 

नाति भारी प्यारु लग्दु,

क्या बतौण बात,

चक्कड़ीत भारी छ,

कन्दूड़ जान्दा हात ।

 

12/11/2020

Wednesday, September 30, 2020

मुंह छिपाकर जीना होगा

 

ताली बजाई थाली बजाई,

घर घर दीप जलाए,

मुंह छिपाकर जी रहे हैं,

देखो, कैसे दिन आए ?

 

अपनो से, आज है दूरी,

दूर रहकर जीना होगा,

बच गया जो इस दौर में,

चौड़ा उसका सीना होगा।

 

बेकसूर हैं हम सभी,

मुंह छिपाकर जीना होगा,

बचते हुए जी रहे हैं,

जिंदगी को जीना होगा ।

 

रोजगार पर मार पड़ी है,

कैसे घर चलाना है,

जीना सीख लिया है सबने,

यही मंत्र पहचाना है।

 

 

वक्त ही ऐसा आया है,

ये वक्त बीत जाएगा,

जीत होगी मानव की,

मुंह नहीं छिपाएगा ।

 

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू

दिनांक 29/09/2020

कोरोना महामारी के कारण मुंह पर मास्क लगाकर जीवन चल रहा हैै सबका ।  

(हिन्दी पखवाड़ा 14-29 सितम्बर, 2020 में प्रथम पुरुस्कार प्राप्त मेरी रचना)

मलेेथा की कूल