Tuesday, May 2, 2017

बौड़ नि सक्दा पाड़ हम....




कबिता ल्येखि पाड़ का,
गुण गान्दु छौं,
याद औन्दि पाड़ की,
वे पाड़ जान्दु छौं.....

ब्वे बाबु की आस थै,
परद्येस जावा तुम,
ह्वोणि खाणि का खातिर,
रुप्या कमावा तुम.....

जिंदगी का दिन कटेणा,
स्याणि गाण्यौं मा,
ख्वेक सब्बि धाणि हम,
सदानि स्याण्यौं मा.....

म्वोळ माटु ह्वेगि आज,
कख जाणा छौं,
अपणि स्वाणि संस्कृति,
धार लगाणा छौं....

अति प्यारु पाड़ हमारु,
मन सी प्यारु छ,
ब्वे बाबु कु द्येस छ,
दुन्यां मा न्यारु छ.....

ज्वानि बगिगी पाड़ की,
पाणी बगणु छ,
बौड़ि नि सक्दा पाड़ हम,
यनु लगणु छ.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 4.4.2017

Monday, January 23, 2017

हातु सी छुटदु जाणु छ........



लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हातु सी छुटदु जाणु छ......


बित्याँ बीस सालु बिटि,
बत्तीस लाख उत्तराखंडी,
पलायन करि-करिक,
रोजगार की तलाश मा,
देश का महानगरू जथैं,
अपणि ज्वानि दगड़ा ल्हीक,
बग्दा पाणी की तरौं,
कुजाणि क्यौकु सुरक-सुरक,
प्यारा उत्तराखण्ड त्यागि,
आस अर औलाद समेत,
कूड़ी पुंगड़ि पाटळि छोड़ि,
कूड़ौं फर द्वार ताळा लगैक,
कुल द्यब्तौं सी दूर देश,
नर्क रूपी नौकरी कन्नौ,
दूर भाग्दु जाणु छ,
बलिदानु का बाद बण्युं,
प्यारु उत्तराखण्ड राज्य,
हातु सी छुटदु जाणु छ.....

आंकडों का अनुसार बल,
राज्य विधान सभा मा,
पलायन की परिणति का कारण,
पहाड़ की आठ घट्दि सीट,
घट्दु पहाड़ कू प्रतिनिधित्व,
हम्तैं यनु बताणु छ,
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हातु सी छुटदु जाणु छ......

खान्दि बग्त टोटग उताणि,
मति देखा मरदु जाणी,
बिंगि ल्यवा हे!लठ्याळौं,
छौन्दा कू भि होयिं गाणि,
अब नि जावा घौर छोड़ि,
जख छोया ढ़ुंग्यौं कू पाणी,
समळि जावा अजौं भी,
बग्त यू बताणु छ,
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हातु सी छुटदु जाणु छ......

जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासू'
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
2.3.2009 को रचित
दूरभाष: 9654972366

जग्वाळ मा छौं.....



अब मौळ्यार आलु,
डाळि बुटळ्यौं मा,
कुंगळा पात लगालु,
उत्तराखण्ड की डांड्यौं मा,
बुरांस खिलि जालु,
हिंवाळि कांठ्यौं तैं द्येखि,
ऊं तैं रिझालु.....

फ्यौंलि मैत अयिं छ,
भेळ पाखौं मा,
पुंगड़ौं की बिट्यौं मा,
मुल मुल हैंसणि छ,
हमारा लोक गीतु मा,
कालजई ह्वेक बसिं छ.....

ऋतु मौळ्यार पाड़ तैं,
अपणा रंग मा रंगालु,
डांडी हरी भरी ह्वे जालि,
मनख्यौं का मन मा,
कुतग्याळि सी लगालि,
उत्तराखण्ड की धर्ति,
बणि ठणिक सजि जालि,
जग्वाळ मा छौं,
कब आलु मौळ्यार.......
 
कौणी कंडाळि जौन खाई,
पाड़ छ्वड़ि ऊद आई,
भलु नि लग्दु अब पाड़,
अब नि रैगि राड़ धाड़....

खुदेड़ु की खुद हर्चि,
घुग्ति ह्वयिं छन ऊदास,
लंगि संग्यौं सी बात कन्ना,
मोबैल आज सब्यौं का पास....
 
उत्तराखण्डै धर्ति द्यखा,
धै लगौणि छ,
नौट कमै नौट्याळ बणिग्यें,
याद नि औणि छ........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 16.1.2017

मलेेथा की कूल