सदानि,
क्या यख रौला?
माया का बस ह्वैक,
यनु भि लगणु छ,
यीं धरती छोड़िक,
कबि नि जौला....
धेल्ला पैंसा मा,
घर बार छोड़िक,
जन्मभूमि सी दूर,
परदेश मा,
डुब्याँ रौला,
धीत भरिक,
मेहनत की खौला...
एक दिन,
यनु भि आलु,
सब्बि धाणि छोड़ी,
"सोचा दौं"
हे चलि जौला....
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
१७.४.२०१२
गढ़वाळि कवि छौं, गढ़वाळि कविता लिख्दु छौं अर उत्तराखण्ड कू समय समय फर भ्रमण कर्दु छौं। अथाह जिज्ञासा का कारण म्येरु कवि नौं "जिज्ञासू" छ।दर्द भरी दिल्ली म्येरु 12 मार्च, 1982 बिटि प्रवास छ। गढ़वाळि भाषा पिरेम म्येरा मन मा बस्युं छ। 1460 सी ज्यादा गढ़वाळि कवितौं कू मैंन पाड़ अर भाषा पिरेम मा सृजन कर्यालि। म्येरी मन इच्छा छ, जीवन का अंतिम दिन देवभूमि उत्तराखण्ड मा बितौं अर कुछ डाळि रोपिक यीं धर्ति सी जौं।
Tuesday, April 17, 2012
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बहोत सुंदर रचना जिज्ञासु जी।
ReplyDeleteकभी जरा मेरा ब्लॉग मा भी ऐ के अपना विचार दिया
http://garhwalikavita.blogspot.com
धन्यवाद
जीवन की हकीकत बयां करती एक सुन्दर प्रस्तुति..... ऐसा दार्शनिक भाव अनुभव से ही आता है.... आभार !
ReplyDeleteएक बात जयाड़ा जी, यह कहना चाहूँगा कि मै कोशिश करता हूँ कि कुछ गंभीर लेख लिख सकूं. आपने शायद देखे हों, परन्तु आपकी ओर से कोई प्रतिक्रिया कदाचित ही आयी हो....
अभी नवीनतम पोस्ट चन्द्र सिंह गढ़वाली पर हैं परन्तु आपने शायद ही पढ़ा हो.... एक बार पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें.