Monday, August 13, 2012

"माता और पिता"


औलाद के लिए,
त्याग करते हुए,
अपना जीवन बिता देते  हैं,
और अंत में उन्हें मिलता है,
कष्टदायी बुढ़ापा,
दुर्बलता की कगार पर,
पहुंच चुका शरीर,
जहाँ होती है,
औलाद से सेवा की अपेक्षा,
कितने कर पाते हैं,
सच्ची सेवा?

माता और पिता के बिना,
सूनापन आ जाता है,
इंसान के जीवन में,
जो ममता के धनी होते हैं,
औलाद के लिए अपनी ,
जिनकी सेवा करने में,
अपार सुख मिलता है,
एक मौका होता है,
हर इंसान के लिए,
जिन्दगी में,
अगर समझ सको.
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" 
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
१३.८.२०१२ 

"क्या बोन्न तब, कविमन का ऊमाळ"


बुढ़ापा का दिन,
बौड़ि ऎगिन,
क्या पाई?
क्या खोई जग मा?
अपणा भी अब,
दूर ह्वैगिन,
जौं फर थौ सारू हमारू,
जिंदगी अब,
यनि लगणि छ,
जन हो मुंड मा,
बोझ अर भारू,
हे! बद्रीविशाल जी,
अब तू ही छैं,
रक्षपाल हमारू,
पर यु ह्वक्का,
असली दगड़्या,
बीच मा जू धरयुं हमारू....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" 
(रचना सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित)
१३.८.२०१२ 
तस्वीर: श्री शूरवीर सिंह रावत, पत्रकार और ब्लागर जी का सौजन्य सी। 

Monday, August 6, 2012

"बसगाळ की मार"



देखा दौं हपार!
दिदा ऎंसु या
बसगाळ की मार छ,
प्रकृति कू प्रकोप,
सबक भिछ,
नि बसणु बल धौळि का धोरा,
जन बगल मा भला नि होन्दा सोरा,
कुजाणि कब छत्यानाश करि द्योन,
बेरहम ह्वैक पर्वतजन कू,
जन उत्तरकाशी अर चमोली मा ह्वै,
हे बद्रीविशाल जी क्या कसूर थौ,
प्यारा पर्वतजन कू.......
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु" 
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित ६.८.२०१२)

Thursday, August 2, 2012

"रौंत्याळि अखोड़ी"



आंख्यौं मा बसिं छ,
पराणु सी प्यारी अखोड़ी,
नौ खम्ब्या तिबारी जख,
चौक मा लैंदी भैंसी गौड़ी.....
इन्द्रमणि जी की जन्मभूमि,
स्या प्यारी अखोड़ी,
धन धन हे बडोनी जी,
चलिग्यन जन्मभूमि छोड़ी....
उत्तराखंड कू सुपिनु देखि,
कल्पना आज होयिं साकार,
धन होयिं छ प्यारी अखोड़ी,
बडोनीजिन करि उपकार.... 
अति प्यारू लग्दु छ,
अखोड़ी कू दुमका बाजार,
कथगा प्यारी रौंत्याळि छ,
अखोड़ी मा ताल की धार...
महादेव कू खंभ ल्ह्यौन्दा,
अखोड़ी का लोग रन्दा अग्वाड़ि,
भारी लंगट्यार लगि जांदी,
जख हेरदु जावा पिछ्वाड़ि...
अखोड़ी मा जब झंडा लगि जान्दु,
फिर शुरू ह्वै जांदी छ रामलीला,
रणभूत नाचौन्दा छन जख,
धूमधाम सी होंदी पांडव लीला...
चौ दिसौं रौंत्याळि अखोड़ी,
देवी देवतौं कू छ वास,
नागराजा, नागेला, नरसिंग, 
घण्ड्याळ जी पूरी करदा आस....
सोळा जाति का लोग,
करदा छन अखोड़ी मा वास,
दूर परदेश मा भी छन,
औन्दा छन अखोड़ी का पास..... 
दूर देश मा बसीं रंदि,
मन मा  रौंत्याळि अखोड़ी,
खुद लगदि ऐ जांदा,
आँख्यौं मा आंसू बौड़ी...
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
अखोड़ी निवासी श्री बी. यस. रावत जी के अनुरोध पर रचित मेरी रचना "प्यारी अखोड़ी"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित २.८.२०१२) 

Wednesday, August 1, 2012

"हिमालय हंसता हैं"


हमें देखकर,
और मूक होकर कहता है,
क्या कर डाला आपने?
मैं और मेरी सदानीरा नदियाँ,
आपके लिए वरदान हैं,
लेकिन! एक प्रश्न है,
आज हमारे सामने,
कैसे कायम रहेगा,
हमारा अस्तित्व,
जो खतरे में पड़ गया,
हे मानव! आपके कारण...

राजा भागीरथ का,
भागीरथ प्रयास,
भागीरथी के लिए,
और आपके लिए ही था,
कहीं व्यर्थ न चला जाए,
हे मानव! आपके कारण,
हमारे बिना क्या संभव है?
आपका जीवन....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टिहरी गढ़वाल,उत्तराखंड.
दूरभाष: ०९६५४९७२३६६ 
  
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: १.८.२०१२

Wednesday, July 11, 2012

"हे! बौड़िक ऐगि बसगाळ"


कवि:जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(दिल्ली प्रवास से...)
हे दिदौं, हे भुलौं,
हे मेरा मुल्क का  मनख्यौं, 
देखा देखा बौड़िक ऐगि,
फिर काळु  बसगाळ,
हमारा प्यारा मुल्क पहाड़,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ.....

डांडी काँठ्यौं मा,
हरयाळि फैलिगि,
गाड गदन्यौं मा पाणी,
छोया फूटिग्यन धारू धारू,
सेरौं मा रोपणि लगण लगिन,
कुयेड़ी हेरि हेरि बेटी ब्वारी,
अफुमा खुदेण लगिन,
गाड -गदन्यौं अर,
धौळ्यौं कू सुँस्याट,
ज्यूकड़ि मा पैदा कन्नु धक्ध्याट,
रिम झिम बरखा लगिं,
हाथ मा लाठी पकड़ी बौडा,
छतरी ओढ़ी लग्युं छ,
समधी जी का गौं का बाट....

दिन भर लगिं,
बसगाळ्या बरखा,
छोरा छन बोन्न  लग्यां,
हे बोडा हे बोडी भीतर सरका,
डांडी काँठ्यौं मा,
भागण मा लगिं,
बसगाळ्या कुयेड़ी,
कैकु तैं छ खुद खुद लगणि,
कैका मन मा आस जगणि,
 "हे! बौड़िक ऐगि बसगाळ",
हमारा प्यारा मुल्क पहाड़,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ....
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित 11.7.2012)

Thursday, July 5, 2012

"बसगाळ बोडा! अब त ऐजा"

कवि-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
 (दिल वालों की दिल्ली से)
क्यौकु चुप्प चाण्या छैं,
भारी भक्कु  लगण लग्युं छ,
ऐंसु हमारा मुल्क का मनख्यौं,
कब  बौड़िक ऐल्या तुम,
नजर लगिं छ तुम फर,
तब ऐल्या जब भारी बिति जालि?
हमारा ज्यु पराण फर,
वन भी लोग पाणी का बिना,
तरसेणा छन,
भक्कान भभसेणा छन,
पाणी मिलु न मिलु,
अपणा गौळा तर्र कन्न का खातिर,
हाथन व्हिस्की, रम अर बियर,
पहाड़ का शैर अर बाजार मा,
जन पौड़ी, श्रीनगर, नै टीरी,
वे नेतौं का प्यारा देरादूण,
क्या ब्य्खना क्या सुबेर,
देखां लुकां ढंका पेणा छन,
झट्ट बौड़िक अवा,
हे !बसगाळ बोडा जी,
अब त बिंगा आप,
लोग गाळी भी देणा छन,
कनु मुर्दा मरि ये दयोरा कू, 
कब होलि बरखा?
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित ५.७.१२)  
 माननीय भीष्म कुकरेती जी की रचना 'मानसून अ दगड मुखसौड़' पढिक मेरा मन मा या अनुभूति कविता का रूप मा.

मलेेथा की कूल