Tuesday, September 11, 2012

"पंछी छौं पहाड़ कू"

लखि बखि बण बिटि,
भारी दूर उड़िक,
जन पोथ्लु उड़ान्दु,
जै मुल्क पौंछिगि,
जन भी हो फेर,
वखि कू ह्वै जान्दु.....
 
पहाड़ कू मनखि भी,
वे पंछी की तरौं,
रोजगार का खातिर,
दूर चलि जान्दु,
जै सैर मा रंदु फेर,
सुखि दुखि जन भी हो,
परदेसी ह्वै जान्दु...
 
फेर भी वैका मन मा,
कवि "जिज्ञासु" की तरौं,
"पंछी छौं पहाड़ कू"
यनु भाव औन्दु,
प्यारा पहाड़ की याद,
प्रवास की पीड़ा,
सदानि झेळ्दु झेळ्दु,
मन अपणु बुथ्यौंदु.....
कवि की कल्पना: 
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित,
११.९.२०१२  

Friday, September 7, 2012

"भूत भट्याई"


एक दिन मैकु, हमारा गौं का न्यौड़ु,
धौण घुमाई पिछ्नै, देखि मैन एक घोड़ु.
क्या बोन्न हे दगड़्यौं, फेर त क्या थौ,
मेरी ज्युकड़ी, धक् धक् धक्क्द्याई,
पढण लग्यौं हनुमान चालीसा,
अगनै कदम बढाई.......

भूत भग्यान फेर मेरा अगनै,
स्याळ बणिक आई,
भारी डौर लगि तब मैकु,
निर्भागिन भारी खिंख्याट मचाई....

ज्युन्दा ज्यू मेरु, रांगु माटु बणिगी,
फेर एक चिलांगु सी भभताई,
क्या बोन्न हे दगड़्यौं,
वीं विपदा की घड़ी मा,
कुलदेवता मैन पुकारी,
तब  कठुड़ कू नरसिंग हमारू,
जोगी का भेष मा आई,
हाथ मा जौंका टेमरू कू लठ्ठा,
मैकु बात बताई,
ना डर तू हे मेरा भगत, 
मैं छौं तेरा दगड़ा,
भोळ चढै तू रोट प्रसाद,
मेरा मंडुला मू अैक,
बात बतै या तू,
अपणा घौर मू जैक.....

बात छ या  मेरा बचपन की,
आज भि याद छ औणि,
रात अँधेरी भौत थै वे दिन,
जब मैकु "भूत भट्याई".......
गढ़वाळि कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा(जिज्ञासु) 
7.9.2012

Monday, September 3, 2012

"यीं दुनियां कू सच"

लोभी होंदु छ मनखि,
लोभ का कारण,
भ्रम मा पड़िक,
डोळ्दु रंदु छ,
मैं कथगा खौं,
मेरु कथगा हो,
दुनियां मा सबसि ज्यादा.... 

अंत समय तक,
लग्युं रंदु वैकु मन,
जमीन जैजाद फर,
पैंसा टक्का फर,
लंगी संग्यौं फर,
जौँ सनै अपणु माण्दु..

जै दिन मनखि कू,
ज्यू पराण छुटि जान्दु,
तब लंगी संग्यौं कू,
ज्यु पराण भी,
लालच मा ऐ जान्दु,
अब त यु चलिगि,
काया छोड़िक,
तब देख्दा छन,
वैकु किस्सा टटोळिक,
कखि पैंसा टक्का,
त निछन रख्यां,
बदन मा क्वी,
सोना चाँदी की चीज....

मनखि का दगड़ा,
कुछ नि जान्दु,
जांदी छ भलाई बुराई,
क्या आपतैं,
यीं दुनियां कू सच,
समझ मा नि आई?
-जगमोहन सिंह जयाड़ा(जिज्ञासु)
सर्वाधिकार सुरक्षित
३.९.२०१२  
Bhishma Kukreti जयारा जी नराज नि हुंयाँ
आपन गढ़वाल प्रकृति पर भौत लेखी आल
अब समौ आई गे कि आप भौं विषयूँ पर बि कविता रचो
इन लगणु च आपकी कविता अब कखिम थमी सी गेन

Thursday, August 30, 2012

"अतीत,वर्तमान,भविष्य"


(अतीत)
पैलि बल सात हाथ का,
लम्बा जूता होन्दा था,
भड़ सरीखा मन्ख्यौं का,
गढ़ देखि होला आपन,
गढ़वाळ मा,
कनुकै उठै अर चीणि होला,
बड़ा बड़ा ढुंगा,
तब्बि न,
यना रै होला हमारा पुरखा...

क्या बोन्न तब,
अब कूड़ा पुंगड़ा,
आबाद नि रखि सकणा छन....
 
(वर्तमान)
अजग्याल सबसि प्यारी,
वर्तमान की बात छ,
मोबाइल कू धारण,
बोडा हो या बोडी,
दादा हो या दादी,
बुबा जी होन या माँ जी,
सब्ब्यौं की इच्छा रन्दि,
मोबाइल जरूर हो,
नौना,नौनी,नाती, नतणौं,
भला बुरौं दगड़ि,
ज्यू भरिक कन्न कू...

हे ! राम पैलि,
ज्युंदा मरयां की खबर,
गौं तक जाण मा,
मैना लगि जांदा था,
जू क्वी दगड़्या,
गौं नि जै..... 
 
(भविष्य)
पुनर्जन्म जब होलु,
कै जन्म का बाद,
उत्तराखंड का मन्ख्यौं कू,
ह्वै सकदु,
गंगा तब बगणि होलि,
गाड बणिक,
हरिद्वार बिटि,
ऋषिकेश देवप्रयाग की तरफ...

ह्वै सकदु जख हिमालय छ,
वख सागर हो,
तैथिस सागर की तरौं,
जू हम्न नि देखि,
सुणि अर पड़ी छ...
-जगमोहन सिंह जयाड़ा(जिज्ञासु)
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित) 30.8.12 
इन्टरनेट कुमाउनी व गढ़वाली साहित्यकारों व कुमाउनी व गढ़वाली साहित्य के लिए एक वरदान है और इस माध्यम से नए नए साहित्यकार सामने भी आयें हैं . नए साहित्यकारों का आना दोनों भाषाओं के लिए सौभाग्य कि बात है . किन्तु मैंने पाया कि अधिकतर साहित्यकार सौ साल पुराने विषयों को ही उठा रहे हैं.
माननीय कुकरेती जी की यीं बात फर प्रातक्रिया स्वरुप मैन या कविता लिखी...अतीत, वर्तमान अर भविष्य फर.... 


Bhishma Kukreti आपकी भूत , वर्तमान , ar भविष्य कि कविता बांच बढिया कोशिश च कि
भविष्य कि त्र्फान नजर च

Wednesday, August 29, 2012

"त्वैन भि बिंगि"


जू प्यारू गीत, 
स्या घसेरि लगौणि छ,
भागीरथी का छाला,
तै भेळ पाखा फुंड,
यकुलि- यकुलि,
कुजाणि क्यौकु,
कुयेड़ी भि लगिं छ,
ये काळा बसगाळ....

हपार भागीरथी कू,
भारी सुंस्याट होणु छ,
तौ भि स्यु गीत,
हमारी आंख्यौं मा,
दणमण आँसू ल्हौणु छ...

गीत का बोल छन,
तुम बिना स्वामी,
पट्ट मरी जौलु,
द्वी चार दिन मा,
हे लठ्याळि चैता,
"त्वैन भि बिंगि"
रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा(जिज्ञासु)
ऋतु  बसगाळ-२०१२ (२९.८.२०१२) 
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित) 

Monday, August 27, 2012

"पहाड़ फर आफत"


आज किलै आई?
अँधेरी रात मा,
द्योरू गिड़गिड़ायी,
धौळी का धोरा बस्याँ,
उत्तराखंडी भै बंधो फर,
जन उत्तरकाशी मा,
भारी आफत आई,
रक्षा करा,
हे! बद्रीविशाल जी,
हे! कुल देव्तौं,
लौल पुकार मचाई...

कैन चलि चाल?
देखदारौं की,
समझ मा नि आई,
कूड़ी पुंगड़ि बग्यन,
क्वी मौत मुख मा समायी,
जैकी रै बच्वारि,
वेन अफु या कैन,
 वैकी जान बचाई,  
मेहरबानी उंकी छ,
जौन लालच मा पहाड़,
कच्च्याई, ठक्कट्याई...

यनु त होण ही थौ,
तुमारा गौं मा,
सैणी सड़क जू आई?
डाळा कटेन, माटु बगि,
रगड़ा ऐन, पाखा रड़्यन,
तुमारु मन,
दूर देश जाण कू रग्र्याई,
जू रैन जन्भूमि मा,
ऊँ फर त आफत आई...

प्रकृति मा खलल,
भारी बुरी बात छ भाई,
या कवि(जिज्ञासु) मन की,
जीवनकाल की,
आंख्यौं देखि कल्पना छ,
बिंगा अर बिंगावा,
चिपको कू जन्म,
हमारा उत्तराखंड मा ह्वै,
पहाड़ कू सृंगार करा,
पहाड़ कू अन्न पाणी, 
खूब खाई,
क्या एक डाळी रोपि,
जन्भूमि, देवभूमि मा,
या जिंदगी मा लगाई? 
-जगमोहन सिंह जयाड़ा (जिज्ञासु) 
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)


Wednesday, August 22, 2012

"कल ठेका बन्द रहेगा"


ठेकाखाळ हमारा गढ़वाळ,
नेतौं का प्यारा उत्तराखंड,
दारू की दुकानी मा लिख्युं थौ,
जब दरोळों की नजर पड़ी,
भारी ऊदास ह्वैन खड़ा खड़ी,
हैक्का दिन का खातिर भी,
लम्बी लैन मा लगिक,
एक बोतळ लेण पड़ी,
ठेका वाळा की बिक्री  डबल...
घन्ना भै की नजर भि पड़ी,
उदास भी ह्वै मन मा,
अफुमा सोचण लगि,
भोळ कखन प्यौलु,
जाण पड़लु कच्ची पेण,
दमै घेरा,
पौळ्या दिदा का धोरा,
भौत दिन का बाद.....

वेन अपणु मन बुझाई,
एक दिन कि त बात छ,
नि प्यौलु पक्की,
पराण त जाण सी रै,
क्या ह्वै तब, जू भोळ,
ठेका बन्द रहेगा....... 
-जगमोहन सिंह जयाड़ा (जिज्ञासु)
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित) 
23.8.2012

मलेेथा की कूल