एक दिन मैकु, हमारा गौं का न्यौड़ु,
धौण घुमाई पिछ्नै, देखि मैन एक घोड़ु.
क्या बोन्न हे दगड़्यौं, फेर त क्या थौ,
मेरी ज्युकड़ी, धक् धक् धक्क्द्याई,
पढण लग्यौं हनुमान चालीसा,
अगनै कदम बढाई.......
भूत भग्यान फेर मेरा अगनै,
स्याळ बणिक आई,
भारी डौर लगि तब मैकु,
निर्भागिन भारी खिंख्याट मचाई....
ज्युन्दा ज्यू मेरु, रांगु माटु बणिगी,
फेर एक चिलांगु सी भभताई,
क्या बोन्न हे दगड़्यौं,
वीं विपदा की घड़ी मा,
कुलदेवता मैन पुकारी,
तब कठुड़ कू नरसिंग हमारू,
जोगी का भेष मा आई,
हाथ मा जौंका टेमरू कू लठ्ठा,
मैकु बात बताई,
ना डर तू हे मेरा भगत,
मैं छौं तेरा दगड़ा,
भोळ चढै तू रोट प्रसाद,
मेरा मंडुला मू अैक,
बात बतै या तू,
अपणा घौर मू जैक.....
बात छ या मेरा बचपन की,
आज भि याद छ औणि,
रात अँधेरी भौत थै वे दिन,
जब मैकु "भूत भट्याई".......
गढ़वाळि कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा(जिज्ञासु)
7.9.2012
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