Tuesday, February 23, 2016

डांडी कांठी......

डांडी कांठी......

हमारा मुल्‍क की छन,
रौंत्‍याळि अति भारी,
ऊंचि धार बिटि देखा,
हिंवाळि कांठी प्‍यारी....

डांड्यौं मा फैल्‍यां छन,
बांज बुरांस का बण,
जख बगदन गदना लगातार,
दूर बिटि देखा लग्‍दा छन,
जन हो दूध की धार....

अति प्‍यारी लग्‍दि छन,
दूर बिटि हिंवाळि कांठी,
यनि लग्‍दि जन पैरिं हो,
तौंकी सुखिलि ठांटी....
 
डांडा कांठौं कू मुल्‍क,
हमारु छ अति प्‍यारु,
रौंत्‍याळु मुल्‍क देश,
यीं दुन्‍यां मा न्‍यारु......


दिनांक 11.2.2016

भाषा कू श्रृंगार करा.....

भाषा कू श्रृंगार करा.....

बिराणि भाषा अपनैक,
अपणि बोलि भाषा कू,
त्रिस्‍कार कतै न करा,
कथ्गा प्‍यारी छ हमारी,
पित्रु की विरासत,
जौंन हम तक पौंछाई,
कना ह्वैग्‍यन मनखि आज,
अपणि भाषा संस्‍कृति,
त्‍यागि तरस कतै नि आई....

बोलि भाषा सी हमारी,
कायम रन्‍दि पछाण,
जब तक बोलला हम,
उत्‍तराखण्‍डी का रुप मा,
हम्‍न जाणे जाण....


दिनांक 11.2.2016 

ऐनान पूछि....

ऐनान पूछि....

मैं त वनि छौं,
तेरी अन्वार बदल्दु जाणी,
झट्ट देखि मुखड़ि ऐना फर,
यूं आंख्यौं मा आई पाणी.....


ज्वानि का दिन था जबरि,
ऐना रंदु थौ हात मा,
काळी लटुल्यौं हेरि हेरिक,
खुश होंदु थौं मन भारी,
अब क्या बतौण,
देखण कू मन नि करदु,
लटुलि फूलिग्यन,
होयिं छ लाचारी......


हम्न बोलि ऐना कू,
सच दिखौणु तेरु काम छ,
चेहरा बदलि जांदु मनखि कू,
जीवन पथ फर हिटणा छौं,
रखवाळु प्रभु राम छ,
द्वी दिन की होन्दि जिंदगी,
यीं धरती मा हमारु,
सदानि क्या काम छ.....

दिनांक 10.2.2016

 

लिख्दु जांदु छौं......

लिख्दु जांदु छौं......


उत्तराखण्ड की धरती प्यारी,
तेरा गीत गांदु छौं,
तेरी कृपा सी जल्म भूमि,
मैं होंदु खांदु छौं.......


जाणा था सब्बि मनखि,
ऊंकी तरौं मैं भी अयौं,
होणि खाणी का खातिर,
जतन करदु रयौं.......


दर्द भौत सैन मैंन,
परदेश की बात थै,
ऊजाळा की आस मा,
भारी अंधेरी रात थै.......


गीत गावा मुल्क का,
भारी भलि बात छ,
अपणि भाषा कू सम्मान,
हे हमारा हात छ......


जल्म भूमि प्यार मा,
भाषा पिरेमि भिछौं,
लिख्दु जांदु मन की बात,
पहाड़ त्वैसि दूर निछौं......


-जगमोहन सिंह जयाड़ा 'जिज्ञासु',
दर्द भरी दिल्ली बिटि कविमन कू कबलाट

दिनांक 10.2.2016

उत्तराखण्डी ढ़ोल दमौं.....

उत्‍तराखण्‍डी ढ़ोल दमौं.....

औजि दिदा कू परिवार,
साक्‍यौं बिटि बजौणु छ,
परंपरा अपणि निभैक,
उत्‍तराखण्‍ड्यौं नचौणु छ....

जमानु बदलि जब बिटि,
ढ़ोल दमौं कू त्रिस्‍कार होणु छ,
ब्‍यो बरात आज उत्‍तराखण्‍डी,
बैण्‍ड बाजा बुलौणु छ......

यनु होलु त एक दिन,
ढ़ोल दमौं हर्चि जालु,
औजि दिदा तब ढ़ोल दमौं,
किलै अर कख बजालु.....

ढ़ोल दगड़ि वेकु दगड़्या,
दमौं भी चुप ह्वै जालु,
झग्‍नु झेंता झग्‍नु झेंता,
सुण्‍नु दुर्लभ ह्वै जालु.....

ढ़ोल दमौं का बोल हे,
जब खामोश ह्वै जाला,
उत्‍तराखण्‍डी भैं बंधु तैं,
बैण्‍ड वाळा हि नचाला.......

कालजई रौं ढ़ोल दमौं,

कवि जिज्ञासु की आस छ,

प्‍यार करा ढ़ोल दमौं सी,

बिंगणु हे यु खास छ..... दिनांक 5.2.2016

Thursday, February 4, 2016

बचपन का दिन.....


जख हैंसि खेलि बचपन बिति,
वा कूड़ी ह्वैगि आज खंड्वार,
परदेश की जिंदगी जीणु छौं,
बदलिं बदलिं मेरी अन्‍वार......

मन नि बदलि झणि किलै,
मन मा औन्‍दा छन विचार,
प्रवास की जिंदगी होयिं छ,
घर कूड़ी सी आज भि प्‍यार....

जब तक था ब्‍वे बाब प्‍यारा,
चौक मा गोरु भैंसा राम्‍दा था,
चेचेंडा, गोदड़ौं की लब्द्यारि,
ओण बिचारा थाम्‍दा था.....

बुबाजी कू ह्वक्का गुड़ गुड़ान्‍दु,
खुन्टेलि मा मनखि बैठ्दा था,
छ्वीं लगौन्‍दा बानि बानि की,
हम टक्‍क लगैक पढ़दा था.....

बोल्‍दि थै ब्‍वै बुबा जी कू,
तुम दिन भर कछड़ि सजौन्‍दा,
धाण काज तख्‍खि पड़िं छ,
बग्‍त फर नि निब्‍टौन्‍दा....

घर कूड़ी का आज अग्‍वाड़ि,
गुलाब का फूल हि हैंस्‍दा छन,
जान्‍दु छौं जब गौं मैं अपणा,
स्‍वागत मेरु करदा छन.......


दिनांक 5.1.2016

थिंच्वाणि....


आल्‍लु मूळा तैं थेंचिक,
बण्‍दु छ बल थिंच्‍वाणि,
मनख की तेरी गति भी या हि,
ह्वै सकदु त्‍वैन नि जाणि.....

अहसास होणु मन मा,
आंख्‍यौं मा औणु पाणी,
दुख पिछ्नैं पड़्यां छन,
किलै अर कुजाणि.....

यथ्‍गा होण फर भी,
मनखि त्‍वैन नि जाणि,
लग्‍युं छैं लग्‍द बग्‍द,
तेरु बण्‍युं थिंच्‍वाणि.......

माया तेरा मोह मा,
मनखि होयां लोभी,
दिन रात दुख दुखौणा,
अचेत होयुं तौ भी......

थेंचेणु दिन रात मनखि,
कनि गति छ तेरी,
थिंच्‍वाणि बण्‍युं तेरु लठ्याळा,
दुख भी होन्‍दु हेरी......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,

दिनांक 23.1.2016

मलेेथा की कूल