Tuesday, November 30, 2010

"पर्वतजन अर जंगळ"

जबरी बिटि जंगळु की मुनारबंदी ह्वै,
पर्वतजनु कू हक्क हकूक नि रै,
उबरी ऊन "ढंडक आन्दोलन" चलै,
टूटिगि रिश्ता जंगळु सी ऊँकू,
जंगळु फर वन विभाग कू अधिकार ह्वै.

फिर भी "चिपको आन्दोलन" चलैक,
लालची ठेकेदारू सी जंगळ बचैक,
रैणी,चमोली का प्रकृति प्रेमी पर्वतजनुन,
दुनियां मा "डाळ्यौं का दगड़्या" बणिक,
कर्तव्य निभैक, सच मा डंका बजै.
जळ्दा जंगळु की रक्षा करदु-करदु,
कै पर्वतजनुन अपणी जान गवैं,
सरकारी प्रयासुन जंगळ नि बच्यन,
जंगळु कू धीरू धीरू सत्यानाश ह्वै.

पहाड़ का पराण छन प्यारा जंगळ,
जख बिटि निकल्दु छ पवित्र पाणी,
हैंस्दा छन बणु मा प्यारा बुरांश,
बास्दा छन घुघती अर हिल्वांस.
पर्वतजनु कू हरा भरा जंगळु सी,
अटूट रिश्ता छ सख्यौं पुराणु,
कायम रयुं चैन्दु भल्यारि का खातिर,
"पर्वतजन अर जंगळु " कू सदानि.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १४.५.२०१०)
(यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ और हिमालय गौरव पर प्रकाशित)

Monday, November 29, 2010

"मैं"

अपणा दगड़्यौं तैं यू ही बतौलु,
जब मैं यीं धरती मा नि रौलु,
मिटि जालु अस्तित्व मेरु,
बसलु कखि मन पंछी कू डेरु,
चाहत रलि मेरा कवि मन मा,
घुमौं बांज-बुरांश का बण मा,
जख पुनर्जन्म हो मेरु.

सृजन करौं गढ़वाली कविताओं कू,
छ्मोट भरि प्यौं पाणी धौळ्यौं कू,
दर्शन होन पर्वतराज हिमालय का,
बद्री-केदार, चन्द्रबदनी देवालय का,
कुल देवता अर ग्राम देवता का,
माँ-बाप फिर दुबारा मिल्वन,
जन्म हो फिर ऊँका घर मा,
जौन जन्म दिनि, पाळी-पोषि,
प्यारू रयौं ऊँकू, यीं धरती मा.

कर्यन अवलोकन दगड़्यौं,
मेरी रचना,कविताओं कू,
जौंकु सृंगार करि मैन,
मन अर प्यारी कलम सी,
भलि लगलि तुमारा मन तैं,
जौंमा बस्युं रलु मेरु मन,
क्या ह्वै?
जब मैं यीं धरती नि रौलु.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
२३.११.२०१० (प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित)

Thursday, November 18, 2010

"जिंदगी अजीब होती है"

ऐसा कहते हैं लोग,
लेकिन! अपनी जिंदगी में,
दूसरों की जिंदगी को,
कुछ इस तरह देखा...


किसी की खास और,
किसी की आस होती है,
जिसे होता है अहसास,
जिंदगी में ख़ुशी का,
उसे जिंदगी बहुत प्यारी,
संग उसका सुखद,
स्वर्ग जैसा लगता है.

किसी को आस थी इसमें,
ख़ुशी के लिए जी रहा था,
कोई अभागा बन करके,
अपने ग़मों को पी रहा था,
लेकिन जिंदगी कैसे जियें?

कोई कठिन राह चलकर,
आराम से जी रहा था,
अंदाज सबके अपने थे,
किसी के लिए "आस जिंदगी",
हारे हुए के लिए "निराश जिंदगी",
जो जी लिया जिंदगी को,
उसकी जिंदगी खास होती है,
जो हार गया उससे,
उसकी "जिंदगी अजीब होती है"

कालचक्र घूमता है,
जिंदगी भी उसके साथ,
चलती है सभी की,
कितनी अजीब होती है,
सवाल होती है,
कितनी खूबसूरत होती है,
जीते और हारे की,
किस्मत के मारे की,
जरूरत नहीं सहारे की,
जिंदगी बनाना और बिगाड़ना,
हमारे ही हाथ है,
प्राप्त की जिसने खुशियाँ,
समझो,जैसे बरसात है,
कहते हैं लोग,
"जिंदगी अजीब होती है".


रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.
दिल्ली प्रवास से...........१९.११.२०१०
("ये जिंदगी भी कितनी अजीब होती है
बिना जबाब के ही सवाल होती है
आज अगर जी लिए खुशी से तो
फिर भी नहीं समझ सकते है
यह जिंदगी कितनी खूबसूरत होती है"
श्रीमती मंजरी कैल्खुरा की रचना पर मेरी अनुभूति)

Wednesday, November 17, 2010

"बग्वाळ"

जै दिन बानि बानि का,
पकवान बण्दा छन,
वे दिन कु बोल्दा छन,
रे छोरों आज पड़िगी,
बल तुमारी "बग्वाळ"....

पर साल भर मा,
एक त्यौहार यनु औन्दु छ,
जै दिन की करदा छन,
सब्बि भै बन्ध जग्वाळ,
हमारा प्यारा मुल्क उत्तराखंड,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

बग्वाळ का दिन खुश ह्वैक,
मनौन्दा छन,
हमारा मुल्क का मनखि बग्वाळि,
बणौन्दा छन दाळ की पकोड़ी,
अर मसूर की भरीं स्वाळि...

जग्वाळ मा रन्दि छ,
कैकि प्यारी ब्वे बाटु हेन्नि,
कब आला नौना, नौनि,
नजिक छ बग्वाळ,
हमारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.
दिल्ली प्रवास से...........२८.१०.२०१०
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,37.0.html

"बग्वाळ"

जै दिन बानी बानी का,
पकवान बणदा छन,
वे दिन कु बोल्दा छन,
रे छोरों आज पड़िगी,
बल तुमारी "बग्वाळ".

पर साल भर मा,
एक त्यौहार यनु औन्दु छ,
जै दिन की करदा छन,
सब्बि भै बन्ध "जग्वाळ",
हमारा प्यारा मुल्क उत्तराखंड,
कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

"बग्वाळ" त्यौहार का दिन,
मनाला खुश ह्वैक,
हमारा मुल्क लोग बग्वाळी,
बणाला दाळ की पकोड़ी,
अर भरीं स्वाळी.

जग्वाळ मा होलि,
कैकी प्यारी ब्वे बाटु हेन्नि,
कब आला नौना, नौनी,
नजिक छ बग्वाळ,
हमारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.
दिल्ली प्रवास से...........२८.१०.२०१०
http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,37.0.html

"हिमालय बचावा" "पहाड़ कूड़ा घर निछ"

आज आवाज उठणि छ,
कैन करि यनु हाल वेकु,
हे चुचों! यनु त बतावा,
हिम विहीन होणु छ,
जख डाळु नि जम्दु,
हिमालय सी पैलि,
वे हरा भरा पहाड़ बचावा,
बांज, बुरांश, देवदार लगावा,
कुळैं कू मुक्क काळु करा,
जैका कारण लगदि छ आग,
सुख्दु छ छोयों कू पाणी,
अंग्रेजु की देन छ कुळैं,
पहाड़ हमारा पराण छन,
वेकी सही कीमत पछाणा.
कनुकै बच्लु हिमालय?
वेका न्यौड़ु गाड़ी मोटर न ल्हिजावा,
तीर्थाटन की जगा पर्यटन संस्कृति,
जैका कारण होणु छ प्रदूषण,
पहाड़ की ऊँचाई तक,
ह्वै सकु बिल्कुल न फैलावा.
पहाड़ कूड़ा घर निछ,
प्रकृति का श्रृगांर मा खलल,
वीं सनै कतै न सतावा,
ये प्रकार सी प्रयास करिक,
प्यारा पहाड़ बचावा,
हिंवाळी काँठी "हिमालय बचावा".

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
http://hillwani.com/ndisplay.php?n_id=181
सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड( young uttarakhand), मेरा पहाड़(mera pahad), पहाड़ी फोरम पर प्रकाशित)

"नाती की पाती"

दादा चश्मा लगैक,
पढ़ण लग्युं छ,
नाती की पाती,
क्या होलु लिख्युं?
नाती लिखणु छ,
दादा जी क्या बतौण,
तुमारी याद मैकु,
अब भौत सतौणि छ,
बचपन मा तुम दगड़ि,
जू दिन बितैन,
अहा! उंकी याद अब,
मन मा औणि छ.
आज भि मैं याद छ,
जै दिन मैन ऊछाद करि थौ,
तब आपन मैकु,
पुळक खूब समझाई,
पर मेरा बाळा मन मा,
उबरि समझ नि आई.
अब मैं बिंगण लग्युं छौं,
आपसी आज दूर हवग्यौं,
पुराणी यादु मा ख्वग्यौं,
अब मैं जब घौर औलु,
चिठ्ठी मा जरूर लिख्यन,
क्या ल्ह्यौण तुमारा खातिर,
अब ख़त्म कन्नु छौं पाती,
तुमारा मन कू प्यारू,
मैं तुमारु नाती.....
रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
http://hillwani.com/ndisplay.php?n_id=181

मलेेथा की कूल