Tuesday, October 15, 2013

"जखळयाण"


या जिंदगी लगणि छ,
सोचा दौं दिदा भुलौं,
सब्‍बि बोदा दु:खि ह्वैक,
हैंसि हैंसि अर रवैक,
काटणा छन जिंदगी तैं,
पै अर कुछ ख्‍वैक,
तौ भी मन मा रंदि,
जिंदगी की चाह,
कैन भी नि ली सकि,
यीं जिंदगी की थाह,
अयां कख जौला कख,
कब तक रौला यख,
यनु कैन भी नि सोचि,
सोचि त सिर्फ सोचि,
या जिंदगी जखळयाण....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
14.10.2013




"नि खाण पैल्‍या तुम"

बोलि थौ गौं की एक बोडिन,
तुमारी मुखड़ि डांग फर लगलि,
निहोण्‍यां निखाण्‍यां तुम,
तुमारा गोरुन मेरा पुंगड़ा,
ऊजाड़ खयालि,
चब्‍बट्ट करयालि,
जबरि हम गोरु चरौण,
गौं का बण फुंड था जयां,
बचपन का बग्‍त,
आज भौत याद औंदा,
छन ऊ बचपन का दिन,
फिर बोडिन औळाणु करि,
जब हम घौर पौंछ्यौं,
ब्‍वे बाबुन भी बोलि,
नि खाण पैल्‍या तुम,
भग्‍तु का बाबान,
ऊ कंडाळिन सपोड़ि,
डंडा की मार,
हम फर भि पड़ि,
कख गैन आज ऊ दिन....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
15.10.2013

Thursday, October 10, 2013

"गढ़वाळि कविता"

नि लिखेणि छन अजग्‍याल मैं सी,
यनु लगणु छ जनु ढौंडा पड़िगी भैंसि,
मन मा उठणि बौळ सी,
औणि छ बौळया, धुंधकारी जी की याद,
लिखणु छौं आज, भैात दिनु का बाद,
मैं यनु भि लगणु छ मेरु कविमन,
पहाड़ की काखड़ी मुंगरी की खोज मा,
कखि प्‍यारा पहाड़ त नि चलिगि,
पर मैकु त सच मा उत्‍पात करिगि,
मेरा कवि दगड़्यौं अब रस्‍ता एक हिछ,
कखि गढ़वाळ मा बाक्‍की मू जावा,
किलै नि लिखेणि छन गढ़वाळि कविता,
यांकु स्‍यूंत भेद जरुर लगावा.......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
7.10.2013
 

"ढुंगा हि बण्‍यां रौला"

ढुंगू सी बण्‍युं छौं मैं आज,
अपणु मुल्‍क छोड़िक,
ब्‍वै बाबु सी मुक्‍क मोड़िक,
यु निर्भागि पेट नि होंदु,
त यनु किलै होण थौ,
सोच्‍दु छौं मैं भौ कबरि,
तुम भि यनु हि सोच्‍दा होला,
भै बन्‍धौं, क्‍य कन्‍न तब,
ढुंगा हि बण्‍यां रौला.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
3.10.2013





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