उत्तराखंड के ऊखीमठ,
चुन्नी, मंगोली, बामण खोली,
किमाणा, गिरिया मनूसना गाँव,
जहाँ १३ सितम्बर-२०१२ को,
बरसात की अँधेरी रात में,
बेखबर सोये वहां के लोग,
जिन्हें कुछ पता नहीं था,
कुदरत आज कैसा कहर,
ढाने वाली है उन पर,
बेरहम बेदर्द होकर.......
विनाश लीला का तांडव हुआ,
आकाश से गिरते पनगोलों ने,
पैदा की एक भयंकर आवाज,
बह चला मलवा और पत्थर,
तबाही का सैलाब लेकर,
इन गांवों की तरफ,
लीलता हुआ इंसानों का जीवन,
जो जी रहे थे जिंदगी,
क्या होने वाला है,
उससे बेखबर,
क्या होने वाला है,
उससे बेखबर,
जिंदगी से जंग करते हुए
सुन्दर सपने संजोये हुए.....
जो बच गए,
उस भयानक मंजर से,
घायल और त्रस्त होकर,
खौफ उन्हें अब भी,
सताता होगा,
शैतान की तरह,
कभी नहीं भूलेंगे,
प्रकृति के रौद्र रूप को......
शैतान की तरह,
कभी नहीं भूलेंगे,
प्रकृति के रौद्र रूप को......
जो देख रहे होंगे,
प्रकृति की विनाश लीला,
आ रहे होंगे,
दुःख का इजहार करने,
उन्हें दिख रहा होगा,
प्रभावित लोंगों की आँखों में,
जिंदगी कैसे जिएगें अब?
वो दुःखद वक्त तो गुजर गया,
लेकिन कभी नहीं भूल सकते,
"वो भयानक रात"......
Poet-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित ब्लॉग पर प्रकाशित
18.9.2012
आ रहे होंगे,
दुःख का इजहार करने,
उन्हें दिख रहा होगा,
प्रभावित लोंगों की आँखों में,
जिंदगी कैसे जिएगें अब?
वो दुःखद वक्त तो गुजर गया,
लेकिन कभी नहीं भूल सकते,
"वो भयानक रात"......
Poet-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित ब्लॉग पर प्रकाशित
18.9.2012
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