Wednesday, January 23, 2013

"बहुमूल्य बूँद बूँद जल"


जल बिन जीवन,

कैसे सकता है चल,

बहुमूल्य हैं बूँद बूँद,

भविष्य के लिए,

अभी बचाओ जल,

नहीं तो दर्द भरा,

होगा हमारा कल,

बिन जल घोर अमंगल,

इंसान के लिए,

अति आवश्यक है,

जल और जंगल,

बहुमूल्य बूँद बूँद जल......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

23.1.13

"आपका ख़त"


हमारे पास भी आय़ा,

हमारे लिए नहीं था फिर भी,

फेसबुक हमारे पास लाया,

पढ़कर पता लगा,

आपकी कुशल क्षेम का,

कामना है,

ये ख़त आपके उन तक,

जरूर पहुंचा होगा,

जबाब का इन्तजार,

हो सके तो जरूर करना 

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

"बिखर रहा बचपन"


तन मन मेरा नन्हा,
बिखर रहा बचपन माटी में,
मुझे पता नहीं है,
निश्चिंत हो माटी के संग,
खेल रहा हूँ,
ऐसा है बचपन मेरा,
बीतने पर नहीं लौटेगा,
मुझे पता नहीं है,
मैं तो मस्त हो माटी में,
एक अलख जगा रहा हूँ,
बीता होगा बचपन आपका,
माँ और माटी के संग,
याद दिला रहा हूँ।
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
24.1.2013


 

Monday, January 14, 2013

"मैं पवित्र गंगा"



आपकी नजर में भी,
फिर क्यों,
मैली करते हो मुझे?
जबकि मै मैली हो गई,
आपके तन के मैल,
और पापों को धोते धोते,
किसने कहा आपको,
मुझे अपवित्र करो,
क्या चाहते हो आप,
कि मैं ऐसा कहूँ,
करूणा करते करते,
मुझे अपवित्र मत करो,
मैं अगर रूठ गई,
कुपित होकर चली गई,
फिर एक भागीरथ को,
जन्म लेना होगा,
मुझे फिर धरती पर,
लाने के लिए,
मेरा विलुप्त होना,
अभिशाप होगा,
धरती पर मानव,
और प्रकृति के लिए,
ऐसा न हो,
मेरी पवित्रता का,
सम्मान करो,
"मैं पवित्र गंगा" हूँ
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
 सर्वाधिकार सुरक्षित ब्लॉग पर प्रकाशित,
14.1.2013 

"कविमन कू दर्द"

कविता का रूप मा,
प्रगट करदु छ कवि,
अपणि कलम सी,
आखर लिखिक,
कोरा कागज फर,
अनुभूति का रूप मा....
जन्मभूमि छोडण कू दर्द,
कर्मभूमि मा,
प्रवास भुगतण  कू दर्द,
भाषा की दुर्गति कू दर्द,
विलुप्त होन्दि संस्कृति कू दर्द,
जन्मभूमि पहाड़ फर,
पैदा होन्दि प्राकृतिक,
बेदर्द आफत कू दर्द,
बिना बात पहाड़ की,
शान मा खलल पैदा करदा,
लोभी मनख्यौं का,
मचैयाँ उत्पात कू दर्द,
हिमालय का चून्दा,
तरबर आँसू कू दर्द,
गंगा यमुना का,
बगण का बाटा मा,
खलल पैदा होण कू दर्द,
प्रदूषण का कारण,
प्रकृति मा पैदा होंदा,
विकार कू दर्द,
उजड़दा बजेंदा घर गौं की,
दुर्गति कू दर्द,
टूट्दा रिश्तों की डोर,
बिखरदु समाज,
आधुनिकता कू आडम्बर,
संवेदनहीनता कू दर्द,
बेटी एक बोझ छ,
मनख्यौं का मन मा,
पैदा होन्दि गलत बात,
जू एक दर्द छ,
कविता का रूप मा,
"कविमन कू दर्द"....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
 सर्वाधिकार सुरक्षित ब्लॉग पर प्रकाशित,
14.1.2013 

Friday, January 11, 2013

"पीठ मा पहाड़ मुण्ड मा पहाड़"



देखि होलु तुम्न वे प्यारा पहाड़,
माँ बैणयौं कू उठैयुं हंसी ख़ुशी मन सी,
पहाड़ का बाटौं फुंड ऊद्यारी ऊकाळी,
पीठ मा पहाड़ मुण्ड मा पहाड़....

हँसी ख़ुशी मन सी करदु रन्दि छन,
ज्व छ उंकी धाण-ज्व छ उंकी धाण,
सोच्दि भी मन मा प्यारा पहाड़ छोड़ी,
बिराणा मुल्क हे क्यौकु हम्न जाण,
जनु भी मिललु यख लग्युं ज्यू पराण,
देखि होलु तुम्न वे प्यारा पहाड़,
माँ बैणयौं कू उठैयुं हंसी ख़ुशी मन सी,
पीठ मा पहाड़ मुण्ड मा पहाड़...

छोया ढुंगयौं कू पाणी पेन्दी,
हेरदि प्यारी हिंवाळी कांठी,
हैंस्दी रन्दि छन वे प्यारा मुल्क,
अफुमा सुख दुःख तैं बाँटी,
देखि होलु तुम्न वे प्यारा पहाड़,
माँ बैणयौं कू उठैयुं हंसी ख़ुशी मन सी,
पीठ मा पहाड़ मुण्ड मा पहाड़...

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
11.1.2013


"ये कलजुग मा"




जू चोरिक खालु, बल मौज मनालु,
लुकारी मवासी धार लगालु,
नितर भूकन प्राण चलि जाला,
मेहनत की खावा, चाहे फ़ोकटये कलजुग की,
जू बल चोरिक खाला,
ऊँ तें लोग इज्जतदार बताला,
चाहे मन बेमन सी,
यना इज्जतदार मनख्यौं की,
जमात अगनै बढदु जालि,
सैत हि क्वी कमी आलि,
ये कलजुग मा
कै हुश्यार मनखि,
अक्ल कू प्रयोग करिक,
दिन रात दुगणा,
फ़ोकट मा पैंसा कमौणा,
खूब खाणा हजम होणा,
ऊंकी बातु मा फंसिक,
सारी पृथि पिथ्याँ मनखि,
कुजाणि क्या क्या होणा,
अपणि संस्कृति धार लगौणा,
ये कलजुग मा
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित
8.1.2013      


मलेेथा की कूल