Friday, August 18, 2017

हे! राम.....



एक मौ का बखरोटा,
लगि बल आग,
एक बाखरी थै तौंकी,
लोगुन देखि भड़ेयीं,
लोण मर्च राळि खौला,
हमारा भला भाग.....

भड़ेयीं बाखरी समझिक,
गौं वाळौन शिकार खाई,
संजोग सी कुछ देर मा,
ऊंकी बाखरी घौर आई.....

तब भारी घंघतोळ ह्वेगि,
हम्न क्या खाई?
सब्बि स्वोच्दा हि रैन,
पर बिंगण मा नि आई....

वीं मौ का एक नातिन ब्वोलि,
हमारु कुत्ता नि दिखेणु,
गौं का सब्बि मनख्यौं कू,
मन अब झिझड़ेणु.......

बात सच्चि निकळि,
बाखरी की जगा कुत्ता भड़ेगि,
सैडु गौं बाखरी समझिक,
कुत्ता की शिकार खैगि......

स्वोचि समझिक सदा,
करयुं चैन्दु क्वी भी काम,
कुत्ता खैग्यन ल्वोग,
क्या बतौण, हे! राम.....

10/8/2017

कमौणा छौं......



स्वोचि आपन कबरि,
हम कागज का टुकड़ा,
गुलामी करि कमौणा छौं,
ज्वानि अपणि गंवौणा छौं,
लोभ लालच का बस ह्वेक,
रिस्ता भी नि निभौणा छौं......

एक मनखि सात समुदर पार,
रुप्या कमौण का खातिर गै,
अपणा देस आई त वेन,
अपणि मरीं ब्वे कु कंकाल पै.....

सच छ, औलाद अगर,
कामयाब छ,
तौ भि सुख नि मिल्दु,
नाकाम छ त,
तब भि सुख नि मिल्दु,
तौ भि हम मनख्यौं कू,
लगिं रन्दि रुप्यौं की बौळ,
सच निछ या दुन्यां,
सच मा एक थौळ......

आज रुप्यौं कु जमानु छ,
इलै रुप्या कमौणा छौं,
अपणा मुल्क सी दूर ह्वेक,
दिल कु दर्द दबौणा छौं.......

रुप्या नि कमौन्दु जु,
घर परिवार दूर ह्वे जान्दा,
रुप्या कमौणा छौं त,
आंखौं मा बसि जान्दा......

10/8/2017

बैख बिचारा......



जनानि की जी हजूरी,
बैखु की लाचारी,
जिंदगी भर समझौता,
जनानि बैखु फर भारी.....

तीन गुण की धनि जनानि,
बैखु फर छन भारी,
फंसि जांदा बैख बिचारा,
बैखु की लाचारी......

पैलु गुण जनान्यौं कु,
मुल मुल हैंसी जाणु,
बैख की मति मारिक,
हैंसी खेली खाणु......

दूसरु गुण झगड़ा कन्नु,
डरदा बैख बिचारा,
शर्म लाज की बजै सी,
ह्वे जान्दा किनारा......

तीसरु गुण रोवा पिट्टि,
बैख डरिक डरि जान्दा,
जनानि की यीं चाल मा,
बैख बिचारा फंसि जान्दा....

यूं तीन गुणु का बल फर,
बैख बिचारु फंसि जान्दु,
जू नि फंस्दु जिंदगी मा,
बेघर हि रै जान्दु......

11/8/2017

सुपिना सच नि ह्वेन......





मन मा भारी खुशी थै होणी, उत्तराखण्ड बणिगी,
बंजेन्दा गौं मा रौनक आलि, मन मा आस जगिगी....

उत्तराखण्डी खुश था वे दिन, बाग था मन मा रोणा,
जन भी रौला उत्तराखण्ड मा, मन अपणु बुथ्यौणा.....

उत्तराखण्ड कु बिकास होलु, बाग था डन्ना भारी,
ऊड्यारु तक बिकास आलु, ह्वे जालि लाचारी.....

सच नि ह्वेन सुपिना हमारा, पाड़ छ खाली होणु,
पलायन की पिड़ा पाड़ मा, हर मनखि छ रोणु......

खाणा कमौणा उत्तराखण्ड मा, भैर का बण्यां पर्वाण,
बौड़ि नि सक्दा उत्तराखण्डी, वख कैन नि जाण....

ताळा लग्यां छन कूड़ौं फर, गौं मा होयुं सुन्नकार,
स्कूल भी बंद होणा,  पलायन की मार....

देख्दु जावा क्या क्या होलु, सब कुछ ऊताणदण्ड,
जु वे पाड़ मा रला, ऊंकू उत्तराखण्ड......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासू
दिनांक 18/8/2017

मलेेथा की कूल