Tuesday, June 30, 2015

कुमाऊं की बारदोली.....



सल्‍ट भारी बीहड़ इलाकु थौ,
अर ऊंचा नीसा डांडा,
फैसला ह्वै,
जब भी क्‍वी बैठक होलि,
रणसिंगा बजैये जालु,
अंग्रेज बोल्‍दा था,
बल यू पहाड़ कू,
खतरनाक टेलीफोन छ......

पटवारी पेशगार तैं,
घूस देणु बंद करेगे,
अब ऊं तैं हर चीज,
मोल ल्‍हीक खाण पण्‍नि थै,
20 सितम्‍बर, 1930 कू,
नयेड़ नदी का छाला,
नरसिंग गिरी का बगड़ मा,
एस.डी.एम. हबीबुर्ररहमान कू,
पुलिस कैम्‍प लगि,
सैडु डंगूला गौं घेरेगि,
गौं मा जू मनखि था,
ऊं फर भारी मार पड़ि,
बचे सिंह जी का घर की,
कुड़कि करेगी,
पुलिसन खूब लूट पाट करि,
घोड़ा दौड़ेक फसलपात,
बरबाद करेगि......

खुमाड़, टुकनोली, चमकना,
जब खबर पौंछि,
रणसिंगा बजि,
कई सौ मनखि,
नयेड़ का छाला कठ्ठा ह्वैन,
फसल कु हर्जानु,
वसूल करेगे,
एस.डी.एम. मजबूर ह्वै,
वापस लौटिगे.....

मौलेखाळ मा सभा ह्वै,
फैसला करेगे,
अत्‍याचारु सी बचण का खातिर,
नेता गिरफ्तार होला,
ठेकेदार पान सिंह पटवाळ,
सबसि पैलि गिरफ्तार ह्वैन,
येका बाद खुमाड़ मा,
पुरुषोत्‍तम जी का यख,
बैठक कू आयोजन ह्वै,
तय करेगे जौंका खिलाफ,
वारंट जारी होयां छन,
अपणि गिरफ्तारी देला,
लक्ष्‍मण सिंह अधिकारी जिन,
आंदोलन कू संचालन करि....

30 नवम्‍बर, 1930 कू,
मोहान डाक बंगला फर,
सत्‍याग्रहियौं कू जत्‍था पौंछि,
डंडा की बरसात ह्वै,
सब्‍बि जेल मा कैद करेग्‍यन....

सिलसिला जारी रै,
चार पांच सिंतम्‍बर, 1942 कू,
खुमाड़ मा भारी भीड़ जमा ह्वै,
गोबिन्‍द सिंह ध्‍यानी जिन,
पुलिस अर एस.डी.एम. कू,
बाटु रोकिक विरोध करि,
जानसनन गोळी चलाई,
गंगाराम अर खिमानंद कांडपाल,
चूड़ामणि अर बहादुर सिंह मेहरा,
शहीद ह्वैन, कुछ लोग घायल ह्वैन,
सल्‍ट की बहादुरी देखिक,
महात्‍मा गांधी जिन,
कुमाऊं की बारदोली की,
पदवी प्रदान करि........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षति,
दिनांक 30'.2015 

Monday, June 29, 2015

तिलाड़ी आन्‍दोलन.......



30 मई, 1930 कू,
तिलाड़ी का मैंदान मा,
जनता की बैठक होणी थै,
धौळी यमुना शांत बगणि थै,
सब लोग बेखबर,
बैठक की कार्रवाई,
ध्‍यान सी सुण्‍ना,
अर देखणा था.....

रज्‍जा की फौज न,
बिना चैतेयां मैदान फर,
चौतरफा घेरु मारिक,
निहत्‍थौं फर गोळी चलाई,
मनखि यथैं वथैं,
जान बचौण का खातिर,
डाळौं मा चड़्यन,
यमुना मा कूद्यन,
कयौं की जान गै,
कई घैल ह्वैन.....

दीवान चक्रधर जुयाळन,
बौळ्या बणिक,
जनता फर गोळी चलवाई,
बेकसूर मनख्‍यौं फर,
अत्‍याचार करवार्इ,
लूटपाट मचवाई,
हजारों लोग कैद करयन,
कई मनख्‍यौं तैं,
कैम्‍प मा ल्‍हेक,
ऊंकी जीवन लीला,
खत्‍म करिक,
ऊंकी लाश यमुना मा,
अपणा पाप लुकौण,
अर ढकौण का खातिर,
बेदर्द ह्वैक बगाई,
यमुना आज भी,
मूक गवाह छ,
वे अत्‍याचारी दिन की.....

यथगा होण का बाद,
कै मनख्‍यौं फर,
मुकदमा चलाई,
बीस साल की कैद,
अर जुर्मानु लगाई,
जैजाद कुड़की करि,
राजशाही का अंत की,
यख बिटि शुरुवात,
शुरु ह्वै थै.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 30.6.2015

सिद्धपीठ मां चन्‍द्रवदनी.....


टिहरी जनपद खासपट्टी मा,
मां चन्‍द्रवदनी कू थान,
चन्‍द्रकूट पर्वत शिखर फर,
होयि छ मां विराजमान......

पूर्व दिशा मा इन्‍द्रजीत पर्वत,
पश्‍चिम दिशा टिहरी डाम,
उत्‍तर दिशा मा खैंट पर्वत,
दक्षिण दिशा देवप्रयाग,
त्रेता युग मा जख ऐ था,
दशरथ पुत्र श्रीराम.......

चौदिशु मा अलकनन्‍दा,
भिलंगना, भागीरथी घाटी,
बदन पड़ी यख मां सती कू,
विष्‍णु न जब सुदर्शन सी काटी...

सिद्धपीठ छ मां चन्‍द्रवदनी मा,
मनोकामना पूरी होन्‍दि,
मां का दर्शन का खातिर,
दूर दूर सी जनता औन्‍दि....

मन्‍दिर न्‍यौड़ु लखि बखि बण छन,
बास्‍दा जख काखड़ हिल्‍वांस,
ऋतु बसन्‍त जब औन्‍दि छ,
मुल मुल हैंस्‍दा लाल बुरांस....

यख बिटि नजर औन्‍दि छन,
हिंवाळि ह्युं की कांठी,
रौंत्‍याळि यनि लग्‍दि छन,
जन पैरिं को ह्युं की ठांटी....


- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित अर प्रकाशित
दिनांक 19.6. 2015

दर्द भरी दिल्‍ली.....


बदलिगी दिल्‍ली देखणा छौं हम,
मैट्रो रेल चलिगी,
धक्‍कम धक्‍का तख भी होणी,
कखि भि ठैस नि रैगि......

डी.टी.सी. मा हाल बुरा छन,
मोबाईल चोरी होणा,
जेब कतरौं कू ढंग बदलिगी,
देखा मौज मनौणा......

कुर्चम कुर्चा होण लगिं छ,
दिल्‍ली तौ भि प्‍यारी,
जाण भि कख छ दिल्‍ली छोड़ी,
होयिं छ भारी लाचारी.....

सब्‍यौं का मन मा बसिं छ दिल्‍ली,
नकली माल खयेणु,
बिजली पाणी नखरा दिखौणि,
दर्द यनु छ सहेणु........

सड़क्‍यौं मा देखा हाल बुरा छन,
गच्‍च होयिं छन गाड़ी,
मार पीट तक ह्वै जान्‍दि छ,
मनखि देखा अनाड़ी......

भैर जवा त हाल बुरा छन,
सस्‍ती होयिं छ जान,
ब्‍याख्‍ना घौर बौड़िक ऐग्‍या,
धन्‍य हो तेरु भगवान.......

दिल्‍ली मा दर्द भौत छन,
कुछ निछ अपणा हात,
जिंदगी जैकि यख कटिगी,
बड़ा भाग की बात........

- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित अर प्रकाशित
दिनांक 22.6. 2015

धन बे दिल्‍ली.....



धन बे दिल्‍ली त्‍वै दिल्‍ली मा,
कथ्‍गा मनखि समौणा,
गढ़वाळि दिल्‍ली मा दनकिक ऐग्‍यन,
अपणु दर्द दबौणा.....

जैं भी कलोनी मा दिल्‍ली मा जावा,
नजर औन्‍दा गढ़वाळि,
घर घर जख्‍या कू तड़का लग्‍दु,
बणौन्‍दा पकोड़ी स्‍वाळि......

वे गढ़वाळ की रौनक हर्चिगी,
दिल्‍ली मा सदानि बग्‍वाळि,
कैका मन मा दर्द बस्‍युं छ,
खुश छन कुछ गढ़वाळि......

कूड़ी बंजेगि कंडाळि जमिगि,
पुंगड़ि पड़िग्‍यन बांजा,
कुछ का मन मा दर्द कतै नि,
बणिग्‍यन दिल्‍ली मा राजा.....

संस्‍कृति कू त्‍याग करिक,
होण लग्‍युं मोळ माटु,
अपणा गढ़वाळ तैं याद नि करदा,
खोज्‍दा नि गौं कू बाटु......

घडयाळा लगणा भूत पुजेणा,
पित्र भी यखि थर्पेणा,
दिल्‍ली भारी स्‍वाणि लगणि,
देब्‍ता भि यखि नचेणा......

दिल्‍ली देब्‍ता समान लगणि,
धन बे दिल्‍ली त्‍वैकु,
दिल वाळौं दिल्‍ली छैं तू,
क्‍या कसूर छ कैकु.......

- जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित अर प्रकाशित
दिनांक 21.6. 2015

Wednesday, June 24, 2015

बसगाळ्या बरखा....



डांडी कांठ्यौं मा कुयेड़ि,
लगिं छ झक्‍काझोर,
बसगाळ्या बरखा ऐगि,
नाचणु मन कू मोर......

तिबारि मा रिटणु बोडा,
ह्वक्‍का का ओर पोर,
बोडि उस्‍यौंण लगिं छ,
भडडु फर तोर.....

गाड गदन्‍यौं मा होण लग्‍युं,
पाणी कू सुस्‍यांट,
बोडा बैठ्युं छ तिबारि मा,
होणु बाखरौं कू भिभड़ाट...

डांड्यौं मा कुयेड़ि रिटिणि,
दिखेणु निछ भैर,
फोथ्‍लौं कू किबलाट होणु,
कखि बासणु मैर......

चौक अग्‍वाड़ि डाळी मा बैठि,
घुघति होयिं ऊदास,
बरखा कू धिड़क्‍वाणि लग्‍युं,
बदळ्यु छ आगास.....

भारी जग्‍वाळ होयिं थै,
कब होलि बसगाळ्या बरखा,
बोडा जी नात्‍यौं तैं बोन्‍ना,
हे चुचौं भीतर सरका.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षति,
दिनांक 25.6.2015

Wednesday, June 17, 2015

रवि अर कवि......

कवि की कल्‍पना,
कल्‍पना मा,
एक ऊड्यार देखणु छ,
तख बल बाग बैठ्युं,
कखि भागीरथी का छाला,
अपणा बच्‍चौं तैं,
प्‍यार कन्‍नु छ,
यख फुंड मनखि,
कतै नि आला.....

अलकनंदा मा,
मसीर माछु फटकणु छ,
देवप्रयाग संगम फर,
पाणी मा दनकणु छ,
किलैकि संगम फर,
क्‍वी माछु नि मारदु,
नहेन्‍दा छन मनखि,
संगम फर जब होन्‍दु,
पर्व कू दिन,
औन्‍दि पंचमी मकरैण,
पिंड दान करदा तख,
जैकु महत्‍व छ भारी,
जख मू भेंटेन्‍दि छन,
सासु भागीरथी,
अर अलकनंदा ब्‍वारि....

चंद्रकूट पर्वत फर,
ऊंचि चोटी मा,
विराजमान छ चंद्रवदनी,
ऋतु मौळ्यार मा,
जख हैंस्‍दा छन बुरांस,
औन्‍दा छन भक्‍तगण जख,
पूरी होन्‍दि मन की कामना,
अर मन की आस,
तख बिटि दिखेन्‍दु,
हैंस्‍दु हिमालय,
पैरि हो जन कांठ्यौं की,
सुखिली ठांटी.....

कवि की कल्‍पना छ,
देवभूमि उत्‍तराखण्‍ड तैं देखौं,
उड़िक अनंत आगास सी,
पंछी, पहाड़, लखि बखि बण,
देखौं जैक पास सी,
कवि जिज्ञासु की कल्‍पना,
अहसास करौणि होलि,
जख नि जान्‍दु रवि,
कल्‍पना मा तख,
पौंछि जान्‍दु कवि.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक 18.6.2015

मलेेथा की कूल