जहाँ ऊंचे शिखरों से,
उतरती हैं जल धाराएँ,
घाटियौं की ओर,
और बहती हुई,
परिवर्तित हो जाती हैं,
नदियों में,
जैसे अलकनंदा, भागीरथी,
भिलंगना, मन्दाकिनी, पिंडर,
गंगा और यमुना के रूप में,
और करती हैं सृंगार,
देवभूमि उत्तराखंड का.
जहाँ मनमोहक सदाबहार,
बांज बुरांश के सघन वन,
झूमते हैं हवा के झोंको से,
जिन्हें निहारकर होता है,
तन मन को सुखद अहसास,
और बसंत में बुरांश,
लाल सुर्ख होकर,
बिखेरता है अपनी छटा,
जिसे देखकर उत्तराखंड हिमालय,
मुस्कराता है मन ही मन.
देवभूमि भी कहलाता है,
जहाँ देवताओं के धाम,
आये थे अतीत में,
सेम मुखेम में श्रीकृष्ण,
देवप्रयाग में भगवान श्रीराम,
जगह जगह जहाँ,
भगवान शिवशंकर के मंदिर,
पंच हैं प्रयाग,
गंगोत्री, यमनोत्री, बद्री-केदार,
माँ नंदा जी का मैत,
माँ गंगा यमुना का मैत,
देखो कितना प्यारा है,
पर्वतजन का "पहाड़".
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित एवं प्रकाशित)
दिनांक: २८.२.२०१२
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देवभूमि के प्रति आपका प्रेम देखते ही बनता है भाई. आपकी यह कविता भी मात्रभूमि को समर्पित है. बहुत आभार.
ReplyDeleteकभी बारामासा पर भी पधारें और अपना सुझाव जरूर लिखें.