Monday, June 8, 2015

मेरु बचपन....


बीति बचपन छै बरस तक,
मुज्‍जफर नगर मा,
याद छ मैकु मरिगे थौ मैं,
एक दिन बीच सड़क मा....
सड़क पार कन्‍न लग्‍युं थौ,
कुजाणि कख बिटि जीप आई,
धक्‍का सी लगि मैं फर,
चारी टैर का बीच पाई....
बचिग्‍यौं मैं बड़ा भाग सी,
उन्‍नीस सौ छयासठ की बात,
कुल देब्‍तौं की कृपा ह्वै,
जोड़दु छौं मैं जौंकु हात.....
गढ़वाळ ल्‍हिग्‍यन बुबा जी मैकु,
ऊ दिन आज भी मैकु याद,
सन सड़सठ कू साल थौ ऊ,
गढ़वाळ बिति बचपन वेका बाद....
स्‍कूल गयौं नौं लिखाई,
हेडमास्‍टर स्‍व. भवानी दत्‍त डंगवाळ,
पाटी बोदग्‍या हात रंदु थौ,
हिटदु उद्यार ऊकाळ.....
याद छ मैकु लड़ै लगि थै,
सन इकहत्‍तर कू थौ साल,
भारी प्रेम थौ गौं गौळा मा,
गरीबी भौत थै गढ़वाळ.....
मन मा भारी ऊलार रंदु थौ,
औन्‍दि बग्‍वाळ लग्‍दा थौळ,
बड़ु होयौं तब लगौण लग्‍यौं,
पुंगड़ौं मा अपणा हौळ.....
मन मा बात बसिं थै मेरा,
ध्‍यान सी कन्‍न पढ़ाई,
बिति बचपन अहसास ह्वै,
जीवन रुपी नाव बढाई....
कसक ऊठि मन मा मेरा,
गढ़वाळि कविता लिखण लगिग्‍यौं,
धरती सी चलि जांदु वे दिन,
मन की बात बतैग्‍यौं......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 21.5.2015

ऊकाळ.....



तीन तड़तड़ी छन,
खास पटटी, टिहरी मा,
चन्‍द्रवदनी मंदिर का न्‍यौड़ु,
ज्‍वान्‍यां की ऊकाळ,
त्‍यूंसा की ऊकाळ,
अर कटारचोट की ऊकाळ,
ऊब देखल्‍या त,
टोपलि ऊद पड़ि जांदि,
लोळ बिटि,
तौ भी हिटदा छन,
मेरा मुल्‍क का मनखि,
ठंडु मठु बोझ भारु ल्‍हीक,
पसीन्‍या चून्‍दु तरबर,
तन बदन मा,
ऊकाळ हमारा मन मा,
एक आस जगौन्‍दि,
हिटण छ लक्ष्‍य तक,
मंजिल का खातिर,
बिना मंजिल जिंदगी,
नि जी सकदु मनखि,
हमारी जिंदगी भी,
एक ऊकाळ छ......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 21.5.2015

Friday, June 5, 2015

मन ही मन खुश होन्‍दु छ.......

एक दगड़या थौ बेरोजगार,
एक व्‍यंग लिख्‍युं छ त्‍वै फर,
मैंन बोलि वेकु,
सुण्‍लि तू यार,
वैन बोलि पैलि तू,
मैकु खाणौं खलौ,
खाणौं खाण का बाद,
वेन बोलि अब,
पेप्‍सी पिलौ,
पेप्‍सी पिलौण का बाद,
वेन बोलि,
खाणौ भौत सवादि थौ,
वेकु मजा माटा मा मत मिलौ,
मैं ये देश की धरती मा,
खुद एक व्‍यंग छौं,
मैकु व्‍यंग न सुणौं,
जौन जन सेवा का नौं फर,
हमतैं बेरोजागारी कू रोजगार दिनि,
कुर्सी मा बैठि मौज करदु रैन......

व्‍यंग वे मास्‍टर का बारा मा सुणौ,
जू हमारा नौनौं पढ़ौण फर ध्‍यान नि देन्‍दु,
अर अपणि औलाद तैं,
अंग्रेजी स्‍कूल मा पढ़ौन्‍दु छ,
वे पुलिस का सिपै का बारा मा बतौ,
जू भ्रष्‍टाचार की गंगा बगौन्‍दु छ,
कानून कू रख्‍वाळु अफु तैं बतौन्‍दु छ,
वे डाग्‍टर का बारा मा सुणौ,
जू मोटी फीस ल्‍हीक,
मरीज तैं टेस्‍ट करौण की,
सलाह देन्‍दु छ,
कमीशन कमौन्‍दु छ,
मरीज तैं बोल्‍दु,
त्‍वै फर भंयकर बिमारी छ,
वे तैं भरमौन्‍दु छ......


अर्थ कू अनर्थ कन्‍न वाळा,
तै व्‍यगंकार तैं सुणौ,
जैकि टक्‍क मोटा लिफाफा फर रंदि,
अर अपणु उल्‍लू सीदा कन्‍न का खातिर,
व्‍यंग तैं अपंग बणौन्‍दु छ,
मन ही मन खुश होन्‍दु छ.......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 5.6.2015

तुम फर हिछ सारु..........

वंत मैं निमाणु मनखि छौं,
आपकी तरौं श्रीमान,
अपणि एक आंखी सी छौ,
भारी परेशान,
लोग बिंगदन मैंन,
अपणि आंखी जाणि बूझिक,
झप्‍पज्‍याई,
आंखिन शान करिक,
मन की बात बताई......

बचपन की बात छ,
स्‍कूल मा एक नौनी,
बैठीं थै हमारा दगड़ा,
जैंकु नौ थौ रेखा,
एक दिन वीन हम जथैं,
बड़ा ध्‍यान सी देखि,
हमारी आंखी झप्‍पज्‍याई,
क्‍लास बिटि हाय हाय करदु,
व भग्‍यान भैर भगि ग्‍याई,
आज भी याद छ,
कुछ देर बाद हेड मास्‍टर जिन,
हमतैं बुलाई,
शर्म नि औन्‍दि स्‍कूल मा,
आंखी किलै झप्‍पज्‍याई,
हम्‍न बोलि साब,
भौत भूल ह्वैगि,
मास्‍टर जिन बोलि,
यनु भी होन्‍दु भूल मा,
अब नि रखणु मैंन,
तू स्‍कूल मा।

बौजी की एक भूलि,
नाता मा हमारी स्‍याळि,
अयिं थै हमारा गौं,
सचि तुमारा सौं,
वीं देखिक हम्‍न,
आदत सी मजबूर,
आंखी झप्‍पज्‍याई,

हम देखि वींका मन मा,
प्‍यार सी जगि ग्‍याई,
झटट हमारा धोरा आई,
बल जीजा जी प्रणाम,
मन की मुराद पूरी ह्वैगि,
आज हे श्रीराम,
बौजिन अपणि भुलि,
हमारी स्‍याळि तैं समझाई,
स्‍यौड़ु छ आंखन यू,
तेरा लैक कतै निछ,
मोळ माटु करि द्याई......

एक दिन बुबाजिन,
मैकु बोलि,
तू अब ब्‍यो करि ले,
नौनि देख्‍याल मेरी देखिं छ,
शरील की कच्‍ची छ,
बच्‍ची छ, तो भि अच्‍छी छ,
जनि भिछ, आखिर नौनि छ,
बड़ा घर की,
हम फर कड़की छ,
मैंन बोलि जल्‍दि क्‍या छ,
बुबाजिन बोलि,
तू गधा छैं, ढै मण कू ह्वैग्‍यें,
मैं फर बोझ छैं,
कब तक बोझ बण्‍युं रैलि,
तू मैं फर,
फंसी जैलि त सम्‍ळि जैलि,
खोटु सिक्‍का छैं चलि जैलि।

धड़कदा दिल सी,
नौनि देखण गयौं,
होण वाळि सासु जी सी,
मुलाकत ह्वै,
मेरी आंखी झप्‍पज्‍याई,
नौनि भीतर छ बेटा,
मैं नौनि की ब्‍वै छौं,
नौनि तैं बुलौं,
मेरी आंखी फिर झप्‍पज्‍याई,
नौनि भैर आई,
बुबा जी की,
इच्‍छा ठुकराई।

मैंन घौर ऐक बुबाजी तैं बताई,
बुबाजिन बोलि आग लग्‍यन,
तेरी जवानि फर,
एक अंज्‍वाळ पाणी मा,
तू डूबि जा,
डूबि नि सकदि,
तैं आंखा फोड़ दी,
जख भी जांदि,
मार खैक औन्‍दि,
राम हि जाणु,
कुजाणि कन,
तैं आंखी झप्‍पज्‍यौन्‍दि।

क्‍या बतौण अब,
आप हि बाटु बतावा,
एक नौनि खुजावा,
जैंकि एक आंखी,
झप्‍पज्‍यान्‍दि हो,
भलु होलु तुमारु,
तुम फर हिछ सारु..........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 5.6.2015

Wednesday, February 25, 2015

मेरा गांव....

जहां तक सड़क है,
छा रहा है सूनापन,
अतीत और आज,
जब तुलना करता हूं,
व्‍यथित होता ,
मेरा जिज्ञासु कविमन...

नहीं दिखते आज,
वो कौंताळ करते बच्‍चे,
घसेरी, पनेरी, बैख,
चौक मा बळ्दु की जोड़ी,
रामदि गौड़ी भैंसी,
लगते थे बहुत अच्‍छे....

आज के स्‍कूली बच्‍चे,
और अतीत के स्‍कूल्‍या,
पीठ पर पाटी लटकाए,
हाथ में कमेड़ा का बोदग्‍या,
लिखते थे लकड़ी की कलम से,
बराखड़ी पाटी पर,
कहते थे गुरु जी,
पाटी पर घोटा लगाकर,
साफ लिखकर लाना,
आज ऐसा नहीं है,
बदल गया जमाना....

भौत रौनक रहती थी,
तब मेरे गांव में,
चप्‍पल जूते नहीं होते थे,
सबके पांव में,
मांगते थे सुलार,
मैं गांव जा रहा हूं,
टल्‍ले लगाए कपड़े,
पहनते थे लोग तब,
उस समय की बात,
सृजन कर बता रहा हूं....


चर्चा होती है आज,
सूने गांव बंजर हैं खेत,
स्‍कूल्‍या लड़के लगाते थे,
अपने खेतों में हल,
आज चले गए है,
उच्‍च शिक्षा की चाह में,
शहरों की तरफ,
सपिरवार सभी,
बैल गांव में आज,
ढ़ूंढ कर भी नहीं मिलते,
सोचो कौन लगाएगा हल,
एक दो जाेड़ी और हळ्या,
लगा रहे हैं पूरे गांव का,
रस्‍म अदायगी रुपी हल.....


आज जमाना अच्‍छा है,
बता रही थी बोडी,
अखोड़ी से ऋषिकेश आती हुई,
बस में जब मैंने पूछा,
बेटा विदेश मेूं,
मैं अब रहती हूं ऋषिकेश में,
रज्‍जा राणी को भी देखा था,
बचपन में मैंने.....

जो भी हो,
गांव जीवित रहने चाहिए,
जहां हमारा मन बसता है,
उत्‍तराखण्‍ड मांगा था हमनें,
अपने गांवों की खुशहाली,
और विकास के लिए,
कब हो सपना पूरा,
इंतजार में है मेरा गांव.....

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
की मन और कलम की बात
दिनांक 26.2.2015

Wednesday, February 4, 2015

यीं जिंदगी मा....

पैंसा पद पैक मनखि,
भ्‍वीं नि देखणा छन,
मन मा मनख्‍वात निछ,
बणौटि बण्‍यां मन....

यनु किलै ह्वै होलु,
ऊ जमानु याद औणु छ,
मनख्‍वात उबरि भारी थै,
यनु बतौणु छ.....

सच मा सोचा दौं चुचौं,
मनखि माटु छ,
जिंदगी हमारी या,
ऊकाळि कू बाटु छ....

लग्‍द बग्‍द सब्‍बि लग्‍यां,
भै बंधी तैं निभावा,
भला बुरा बग्‍त मा,
एक हैक्‍का काम आवा....

एक दिन चलि जाण,
सब कुछ सच निछ,
यीं जिदगी मा भलु करा,
जिंदगी कू सच छ....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
कविमन का ऊमाळ मन कलम सी
सर्वाधिकार सुरक्षित, 5.2.2015
12.40 दोपहर, संपर्क.09654972366

Monday, February 2, 2015

छट्ट छुटिगि...

माछा की तरौं,
हे भुलों सब्‍बि धाणि,
पहाड़ छूटि, मुल्‍क छुटि,
छुटिगि बथौं पाणी....

माळु का पात मा,
भात खान्‍दा था,
धाण काज कू,
पुंगड़ौं जान्‍दा था,
मेल जोल कू जमानु थौ,
होन्‍दि थै मिलि जुलिक धाण,
गौं मुल्‍क का हाल देखि,
ऊदासी मन मा अाज छै जान्‍दि,
उदौळि औन्‍दि खुदेन्‍दु पराण....

बाळु बचपन जैं धरती मा खत्‍युं,
फ्यौंलि बुरांस जख औन्‍दा जान्‍दा,
हैंस्‍दा जख प्‍यारा डांडा कांठा,
वीं धरती सी दूर ह्वैक,
छट्ट छुटिगि सब्‍बि धाणि,
याद जब जब आज औन्‍दि,
तरसेन्‍दु छ पापी पराणी,
जुगराजि रै तू मुल्‍क मेरा,
देव्‍तौं कू देश छैं तू,
हमारा मन की आस भी....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
3.2.2015, दोपहर 12.30,
अपणि कलम सी एक अहसास
सर्वाधिकार सुरक्षित

मलेेथा की कूल