Tuesday, June 9, 2015

बोडि अर बोडा....

किल्‍कणि बिल्‍कणि बोडि बोडा फर,
लाठन छ धध्‍यौणि,
बोन्‍न लगि छ त्‍वै बुढया कू,
मौत भि हर्चि,
कुजाणि क्‍यौकु नि औणि.....

लग्‍द बग्‍द करि भागणु बोडा,
बोन्‍न लग्‍युं छ बचावा,
यीं बुढ़ड़ि कू मुर्दा मरिगि,
हे चुचौं झट पट आवा.....

ढुंगू उठाई निर्भागि बोडिन,
बोडा की लोळ फोड़्यालि,
फेरौं का बग्‍त दिन्‍युं बचन,
बोडिन आज तोड़्याळलि;....

भ्‍वीं मा लठगि बोडा धड़म्‍म,
मुण्‍ड फर ल्‍वै कू धारु,
कळजुगि बुढड़ि मरि जै तू,
अब क्‍या रिस्‍ता हमारु.....

दणमण आंसू ऐन बोडि का,
सोचणि कपाळ फूटिगि,
मति मरिगि आज मेरी,
ज्‍वानि मेरी टूटिगि......

बोडिन बोडा ऊब ऊठाई,
प्‍यार सी मुण्‍डळि फलोसी,
माफ करि देवा मैकु तुम,
बोडि तैं औणि बेहोशी....


बोडा बोन्‍नु निर्भागि बुढ़ड़ि,
अब नि देखण तेरी मुखड़ि,
कनु अनर्थ करयालि त्‍वैन,
कनि छ तेरी ज्‍युकड़ि......

निर्भागि मोळु देखण लग्‍युं,
बोडा बोडि कू तमाशु,
न्‍यौड़ु आई झट पट ऊ,
खांसण लग्‍युं छ खांसू........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 18.5.2015 

बग्‍त....


बग्‍त की बात न पूछा,
होन्‍दु छ बलवान,
बग्‍त कब्‍बि यनु ऐ जान्‍दु,
गधा ह्वै जान्‍दु पैलवान.....

बग्‍त फर क्‍वी काम नि औन्‍दु,
यनि होन्‍दि छ बग्‍त की मार,
बग्‍त की मार सी मरदि दुनियां,
तौ भि चन्‍दु छ संसार......

बोल्‍दन बग्‍त कू दगड़ु करा,
रुक्‍दि ने जैकी चाल,
जू मनखि नि करदु छ,
भला नि होन्‍दा तैका हाल.....

बग्‍त सी खाणु, पेणु, सेणु,
बग्‍त सी अपणा काम करा,
भला बग्‍त कू राज यू हिछ,
जिंदगी मा रंग भरा.....

बग्‍त हमारु आज लठ्याळौं,
एक दिन यनु आलु,
ह्वैगि बग्‍त तुमारु पूरु,
बग्‍त हम्‍तैं यनु चेतालु.......

-कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 31.3.2015

Monday, June 8, 2015

परदेश मा.....


बोल्‍िा थौ स्‍वर्गवासी,
ब्‍वै बुबाजिन मैकु,
तू ढंग सी रै,
कैकि बात्‍तु मा कब्‍बि,
धोक्‍का मा नि ऐ,
अपणा काम सी सदानि,
मतलब रखि,
सुदि नि जाणु कै दगड़ि,
भौं कखि,
भौं कैकु दिन्‍युं,
सुदि न खै,
दरोळि मतोळि सी,
दूर हि  रै,
बस मा बैठलि त,
डरेबर की सीट सी,
चार सीट पिछनै बैठि,
अपणु ख्‍याल रखि,
या जिंदगी अपणा हात छ,
ढंग सी रै परदेश मा......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक: 9.6.2015

मेरु बचपन....


बीति बचपन छै बरस तक,
मुज्‍जफर नगर मा,
याद छ मैकु मरिगे थौ मैं,
एक दिन बीच सड़क मा....
सड़क पार कन्‍न लग्‍युं थौ,
कुजाणि कख बिटि जीप आई,
धक्‍का सी लगि मैं फर,
चारी टैर का बीच पाई....
बचिग्‍यौं मैं बड़ा भाग सी,
उन्‍नीस सौ छयासठ की बात,
कुल देब्‍तौं की कृपा ह्वै,
जोड़दु छौं मैं जौंकु हात.....
गढ़वाळ ल्‍हिग्‍यन बुबा जी मैकु,
ऊ दिन आज भी मैकु याद,
सन सड़सठ कू साल थौ ऊ,
गढ़वाळ बिति बचपन वेका बाद....
स्‍कूल गयौं नौं लिखाई,
हेडमास्‍टर स्‍व. भवानी दत्‍त डंगवाळ,
पाटी बोदग्‍या हात रंदु थौ,
हिटदु उद्यार ऊकाळ.....
याद छ मैकु लड़ै लगि थै,
सन इकहत्‍तर कू थौ साल,
भारी प्रेम थौ गौं गौळा मा,
गरीबी भौत थै गढ़वाळ.....
मन मा भारी ऊलार रंदु थौ,
औन्‍दि बग्‍वाळ लग्‍दा थौळ,
बड़ु होयौं तब लगौण लग्‍यौं,
पुंगड़ौं मा अपणा हौळ.....
मन मा बात बसिं थै मेरा,
ध्‍यान सी कन्‍न पढ़ाई,
बिति बचपन अहसास ह्वै,
जीवन रुपी नाव बढाई....
कसक ऊठि मन मा मेरा,
गढ़वाळि कविता लिखण लगिग्‍यौं,
धरती सी चलि जांदु वे दिन,
मन की बात बतैग्‍यौं......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 21.5.2015

ऊकाळ.....



तीन तड़तड़ी छन,
खास पटटी, टिहरी मा,
चन्‍द्रवदनी मंदिर का न्‍यौड़ु,
ज्‍वान्‍यां की ऊकाळ,
त्‍यूंसा की ऊकाळ,
अर कटारचोट की ऊकाळ,
ऊब देखल्‍या त,
टोपलि ऊद पड़ि जांदि,
लोळ बिटि,
तौ भी हिटदा छन,
मेरा मुल्‍क का मनखि,
ठंडु मठु बोझ भारु ल्‍हीक,
पसीन्‍या चून्‍दु तरबर,
तन बदन मा,
ऊकाळ हमारा मन मा,
एक आस जगौन्‍दि,
हिटण छ लक्ष्‍य तक,
मंजिल का खातिर,
बिना मंजिल जिंदगी,
नि जी सकदु मनखि,
हमारी जिंदगी भी,
एक ऊकाळ छ......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 21.5.2015

Friday, June 5, 2015

मन ही मन खुश होन्‍दु छ.......

एक दगड़या थौ बेरोजगार,
एक व्‍यंग लिख्‍युं छ त्‍वै फर,
मैंन बोलि वेकु,
सुण्‍लि तू यार,
वैन बोलि पैलि तू,
मैकु खाणौं खलौ,
खाणौं खाण का बाद,
वेन बोलि अब,
पेप्‍सी पिलौ,
पेप्‍सी पिलौण का बाद,
वेन बोलि,
खाणौ भौत सवादि थौ,
वेकु मजा माटा मा मत मिलौ,
मैं ये देश की धरती मा,
खुद एक व्‍यंग छौं,
मैकु व्‍यंग न सुणौं,
जौन जन सेवा का नौं फर,
हमतैं बेरोजागारी कू रोजगार दिनि,
कुर्सी मा बैठि मौज करदु रैन......

व्‍यंग वे मास्‍टर का बारा मा सुणौ,
जू हमारा नौनौं पढ़ौण फर ध्‍यान नि देन्‍दु,
अर अपणि औलाद तैं,
अंग्रेजी स्‍कूल मा पढ़ौन्‍दु छ,
वे पुलिस का सिपै का बारा मा बतौ,
जू भ्रष्‍टाचार की गंगा बगौन्‍दु छ,
कानून कू रख्‍वाळु अफु तैं बतौन्‍दु छ,
वे डाग्‍टर का बारा मा सुणौ,
जू मोटी फीस ल्‍हीक,
मरीज तैं टेस्‍ट करौण की,
सलाह देन्‍दु छ,
कमीशन कमौन्‍दु छ,
मरीज तैं बोल्‍दु,
त्‍वै फर भंयकर बिमारी छ,
वे तैं भरमौन्‍दु छ......


अर्थ कू अनर्थ कन्‍न वाळा,
तै व्‍यगंकार तैं सुणौ,
जैकि टक्‍क मोटा लिफाफा फर रंदि,
अर अपणु उल्‍लू सीदा कन्‍न का खातिर,
व्‍यंग तैं अपंग बणौन्‍दु छ,
मन ही मन खुश होन्‍दु छ.......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 5.6.2015

तुम फर हिछ सारु..........

वंत मैं निमाणु मनखि छौं,
आपकी तरौं श्रीमान,
अपणि एक आंखी सी छौ,
भारी परेशान,
लोग बिंगदन मैंन,
अपणि आंखी जाणि बूझिक,
झप्‍पज्‍याई,
आंखिन शान करिक,
मन की बात बताई......

बचपन की बात छ,
स्‍कूल मा एक नौनी,
बैठीं थै हमारा दगड़ा,
जैंकु नौ थौ रेखा,
एक दिन वीन हम जथैं,
बड़ा ध्‍यान सी देखि,
हमारी आंखी झप्‍पज्‍याई,
क्‍लास बिटि हाय हाय करदु,
व भग्‍यान भैर भगि ग्‍याई,
आज भी याद छ,
कुछ देर बाद हेड मास्‍टर जिन,
हमतैं बुलाई,
शर्म नि औन्‍दि स्‍कूल मा,
आंखी किलै झप्‍पज्‍याई,
हम्‍न बोलि साब,
भौत भूल ह्वैगि,
मास्‍टर जिन बोलि,
यनु भी होन्‍दु भूल मा,
अब नि रखणु मैंन,
तू स्‍कूल मा।

बौजी की एक भूलि,
नाता मा हमारी स्‍याळि,
अयिं थै हमारा गौं,
सचि तुमारा सौं,
वीं देखिक हम्‍न,
आदत सी मजबूर,
आंखी झप्‍पज्‍याई,

हम देखि वींका मन मा,
प्‍यार सी जगि ग्‍याई,
झटट हमारा धोरा आई,
बल जीजा जी प्रणाम,
मन की मुराद पूरी ह्वैगि,
आज हे श्रीराम,
बौजिन अपणि भुलि,
हमारी स्‍याळि तैं समझाई,
स्‍यौड़ु छ आंखन यू,
तेरा लैक कतै निछ,
मोळ माटु करि द्याई......

एक दिन बुबाजिन,
मैकु बोलि,
तू अब ब्‍यो करि ले,
नौनि देख्‍याल मेरी देखिं छ,
शरील की कच्‍ची छ,
बच्‍ची छ, तो भि अच्‍छी छ,
जनि भिछ, आखिर नौनि छ,
बड़ा घर की,
हम फर कड़की छ,
मैंन बोलि जल्‍दि क्‍या छ,
बुबाजिन बोलि,
तू गधा छैं, ढै मण कू ह्वैग्‍यें,
मैं फर बोझ छैं,
कब तक बोझ बण्‍युं रैलि,
तू मैं फर,
फंसी जैलि त सम्‍ळि जैलि,
खोटु सिक्‍का छैं चलि जैलि।

धड़कदा दिल सी,
नौनि देखण गयौं,
होण वाळि सासु जी सी,
मुलाकत ह्वै,
मेरी आंखी झप्‍पज्‍याई,
नौनि भीतर छ बेटा,
मैं नौनि की ब्‍वै छौं,
नौनि तैं बुलौं,
मेरी आंखी फिर झप्‍पज्‍याई,
नौनि भैर आई,
बुबा जी की,
इच्‍छा ठुकराई।

मैंन घौर ऐक बुबाजी तैं बताई,
बुबाजिन बोलि आग लग्‍यन,
तेरी जवानि फर,
एक अंज्‍वाळ पाणी मा,
तू डूबि जा,
डूबि नि सकदि,
तैं आंखा फोड़ दी,
जख भी जांदि,
मार खैक औन्‍दि,
राम हि जाणु,
कुजाणि कन,
तैं आंखी झप्‍पज्‍यौन्‍दि।

क्‍या बतौण अब,
आप हि बाटु बतावा,
एक नौनि खुजावा,
जैंकि एक आंखी,
झप्‍पज्‍यान्‍दि हो,
भलु होलु तुमारु,
तुम फर हिछ सारु..........
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक: 5.6.2015

मलेेथा की कूल