Saturday, February 23, 2013

"मित्रों मेरी अनुभूति"


कह रहे थे मुझे वे शराबी,
मैंने आँखों से पी है,
पैंसा नहीं था जेब में,
उधार भी नहीं ली है,
मैं तो गुजर रहा था,
मधुशाला के सामने,
एक शराबी जोर से,
मैकु प्यार से भट्याया,
गौला भी लगाया,
दो पैग भी पिलाया,
प्यार से पिला रहा है,
उसके प्यार को देख,
मुझ जगमोहन सिंह जयाड़़ा,
कवि मन 'जिज्ञासु"" के मन में ,
प्यार का सैलाब आया,
बात है मेरे हिंडोलाखाळ की,
मेरी कल्पना में.......

जगमोहन सिंह जयाड़़ा 'जिज्ञासु" 23.2.13




उस पार न जाने क्या होगा,
मन में प्रश्न एक खड़ा है,
जीने की जंग वहां भी होगी,
यहाँ भी तो जंग लड़ा है,
संगी साथी वहां भी होंगे,
जाना तो अकेला होगा,
यहाँ भी एक मेला सा है,
वहां भी एक मेला होगा,
जगमोहन सिंह जयाड़़ा 'जिज्ञासु" 23.2.13


  • Pramod Singh Rawat nic line sar ji
  • Kundan Rawat मौसम को मौसम की बहारों ने लूटा,
    हमे कश्ती ने नहीं किनारों ने लूटा,
    आप तो डर गये मेरी एक ही कसम से,
    आपकी कसम देकर हमें तो हज़ारों ने लूटा
  • Ankit Bhatt Bhut khub guru jee aur rawat jee.
  • Kundan Rawat नई सी सुबह नया सा सवेरा,
    सूरज की किरण मे हवाओ का बसेरा,
    खुले आसमान मे सूरज का चेहरा,
    मुबारक हो आपको ये हसीन सवेरा. kundan singh
  • Sushil Pant Is paar hai meri madhushala,us paar milegi madhubala.
  • Kundan Rawat ये sms मेरे दोस्त के पास जाना , वो सो रहा हो तो शोर न मचाना
    जब वो जगे तो धीरे से मुस्कराना फिर मेरे दिल का हल बताना kundan singh
  • Kundan Rawat तू चाँद और मैं सितारा होता,
    आसमान में एक आशियाना हमारा होता,
    लोग तुम्हे दूर से देखते,
    नज़दीक़ से देखने का हक़ बस हमारा होता..kundan singh
  • Debesh Bahuguna acha hai bhaisahab.......
  • Arjun GC nice uncle ji..


रात अँधेरी जब हो जाये,
दिया तो जलाना होगा,
आशियाना प्यार का,
उजड़ भी जाये,
फिर से तो बसना होगा,
निर्माण जो करता है,
प्रकृति के जड़ नियम से,
वो जरूर बंधा होगा....... 
-जगमोहन सिंह जयाड़़ा "जिज्ञासु" 23.2.13


"बरसने दो"

बादलों को हर्षाने दो,
बूँद बूंद बरसाने दो,
न जाने कितने सालों बाद,
ऐसा मौसम आया है,
ठण्ड की सौगात लाया है,
पूछो पहाड़ों से,
हिमपात से खुश हुए,
मन जिनका हर्षाया है
जगमोहन सिंह जयाड़़ा 'जिज्ञासु" 23.2.13


"मित्रों मेरी अनुभूति"



कवि  नजर से मैंने दुनिया को देखा,
कुछ दोस्त ऐसे होंते हैं,
समय के साथ बदल जाते हैं,
कोई मजबूरी, समय का अभाव,
लाचारी बताते हैं,
आदत मेरी बुरी है,
मुझे दोस्त बहुत याद आते हैं,
सबका पता तब लगेगा,
जो मेरे सच्चे मित्र होंगे,
कंधे पर उनके,
अंतिम यात्रा पर जाऊंगा,
आँखों में उनके आंसू,
अपनी यादों के झरोखे से,
खूब बहाऊंगा.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षति एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
24.2.13

Friday, February 22, 2013

"खूब हैंसा यीं धरती मा"


मनखि आज मनखि नि रैगि,
हैंस्दु भिछ त सुदि दिखावटी,
कन हैंसदा था मनखि,
मेरा मुल्क प्यारा पहाड़,
जबरी दुःख ही दुःख,
फिर भी खुश रन्दा था,
खित खित अर मचौन्दा था,
भारी खिग्चाट,
पाखा पलटे जांदा था,
मुल मुल भि हैंसदा था,
ये जमाना मा ज्यादा सुख सी,
भौत दुखी छन मनखि,
एक हैक्का देखिक भी,
चार दिन किछ या जिंदगी,
खूब हैंसा यीं धरती मा,
यख सदानि कैन नि रण,
बाकि तुमारी मर्जी,
हैंसा या रोवा,
पर केका खातिर....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
22.2.13




Thursday, February 21, 2013

"कै जन्म कू बदलु लेणी छ"

या जिंदगी,
खून भी पेणि छ,
दिदा भुला बोन्न लग्यां,
भला बुरा भी बोन्न लग्यां,
तू भारी भग्यान छैं,
मैन भी बोलि,
ऊंकी ख़ुशी का खातिर,
भारी मौज छ मेरी,
तुमारी कृपा सी,
पर दुःख मन मा,
एक हिछ,
जन्मभूमि पहाड़ सी दूर,
मेरु मन उदास छ,
"कै जन्म कू बदलु लेणी छ"
या जिंदगी.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित,
21.2.2013



 

Wednesday, February 20, 2013

"यथैं वथैं"




जख ह्वै होला दगड़या,
हमारा तुमारा बचपन का,
जौं  दगड़ि लफड़ेन्दा  था,
भ्वीं फुंड माटा मा,
बचपन अपणु खतदा था,
गौं का बाटा मा,
गौं का बण मा,
जौंका  दगड़ि गोरु चरैन,
आरू, घिंगारू, खैणा, तिम्ला,
छकि छक्किक खैन,
मन आज कुतग्याळी,
हर पल लग्दी छन,
आज ऊ दिन कख गैन,
जौं दगड़ि बाळू बचपन,
बिति अर बिताई,
ऊ दगड़या,
आज "यथैं वथैं" ह्वैक,
कख कख चलिगेन.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
20.2.13


 


Tuesday, February 19, 2013

"पतझड़ में...बसंत में"


पतझड़ में...

गिरा दिए पात अपने,
धरा पर वृक्षों ने,
इस आस में,
कि बसंत आएगा,
हमारा श्रृंगार करने,
पतझड़ है,
बसंत के लिए,
मर मिट गया,
बसंत के,
आगमन से पहले......

बसंत में.....

हो रहा है सृंगार,
वृक्षों का,
कहीं कलियाँ,
कहीं फूल,
खिलने लगे हैं,
बौळया बुरांश,
लगा रहे हैं बंणाग,
बांज के बण में,
हमारे पहाड़ में,
खूबसूरत डाँड्यौं में,
चलो निहार आयें,
चन्द्रबदनी मंदिर के पास,
बसंत में........


-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
20.2.13






Thursday, February 14, 2013

"बौळया बसंत"



बौड़ि ऐगि हे!
लठ्याळी बसंती,
मेरा मुल्क की डांडयौं मा,
खिलला फूल अर हैंसला,
डांडौं अर गंगाड़ फुंड,
डाळी बुटयौं की फाँग्यौं मा...

मेरा ऊलारया मन मा,
मौळयार खुद लगालु,
होलु क्वी भग्यान बिचारू,
डांडौं मा खिल्याँ बुरांशु कू,
रैबार जब मिललु वे,
रौड़ी धौड़ी अपणा मुल्क,
देखण कू आलु...

फ्योंलि बिचारी मैत अयिं,
छयुं छ मौळयार,
पाखौं फुन्ड हैंसण लगिं,
मुल मुल हपार....

हे मेरा मुल्क का मनख्यौं,
बसंत बुलौण लग्युं,
तुमारा ढुंगा होयां मन मा,
होलु कुतग्याळी लगौण लग्युं,
धरती उत्तराखंड की तुमारी,
कन्नि छ जगवाळ,
बौड़ी आवा मुल्क अपणा,
प्यारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ,
"बौळया बसंत" छयुं छ.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित अवं ब्लॉग पर प्रकाशित
15 Feb.2013








मलेेथा की कूल