बौड़ि ऐगि हे!
लठ्याळी बसंती,
मेरा मुल्क की डांडयौं मा,
खिलला फूल अर हैंसला,
डांडौं अर गंगाड़ फुंड,
डाळी बुटयौं की फाँग्यौं मा...
मेरा ऊलारया मन मा,
मौळयार खुद लगालु,
होलु क्वी भग्यान बिचारू,
डांडौं मा खिल्याँ बुरांशु कू,
रैबार जब मिललु वे,
रौड़ी धौड़ी अपणा मुल्क,
देखण कू आलु...
फ्योंलि बिचारी मैत अयिं,
छयुं छ मौळयार,
पाखौं फुन्ड हैंसण लगिं,
मुल मुल हपार....
हे मेरा मुल्क का मनख्यौं,
बसंत बुलौण लग्युं,
तुमारा ढुंगा होयां मन मा,
होलु कुतग्याळी लगौण लग्युं,
धरती उत्तराखंड की तुमारी,
कन्नि छ जगवाळ,
बौड़ी आवा मुल्क अपणा,
प्यारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ,
"बौळया बसंत" छयुं छ.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित अवं ब्लॉग पर प्रकाशित
15 Feb.2013
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