Thursday, February 4, 2016

उत्तराखण्डी ढ़ोल दमौं.....


औजि दिदा कू परिवार,
साक्‍यौं बिटि बजौणु छ,
परंपरा अपणि निभैक,
उत्‍तराखण्‍ड्यौं नचौणु छ....

जमानु बदलि जब बिटि,
ढ़ोल दमौं कू त्रिस्‍कार होणु छ,
ब्‍यो बरात आज उत्‍तराखण्‍डी,
बैण्‍ड बाजा बुलौणु छ......

यनु होलु त एक दिन,
ढ़ोल दमौं हर्चि जालु,
औजि दिदा तब ढ़ोल दमौं,
किलै अर कख बजालु.....

ढ़ोल दगड़ि वेकु दगड़्या,
दमौं भी चुप ह्वै जालु,
झग्‍नु झेंता झग्‍नु झेंता,
सुण्‍नु दुर्लभ ह्वै जालु.....

ढ़ोल दमौं का बोल हे,
जब खामोश ह्वै जाला,
उत्‍तराखण्‍डी भैं बंधु तैं,
बैण्‍ड वाळा हि नचाला.......

कालजई रौं ढ़ोल दमौं,
कवि जिज्ञासु की आस छ,
प्‍यार करा ढ़ोल दमौं सी,
बिंगणु हे यू खास छ..... दिनांक 5.2.2016

खानपुर बस स्टैण्ड फर....


मिलि मैकु एक भुला गढ़वाळि,
भैजि आप कवि जिज्ञासु छन,
मैकु गढ़वाळि मा बच्‍याई,
मैंन पूछि क्‍या होलु आपकु नौं?
तब वे भुलान मैकु बताई,
मैं आपकु फेसबुक दगड़्या छौं,
लक्ष्‍मण सिंह रावत छ मेरु नौं,
आपकी गढ़वाळि कविता पढ़दु छौं....

खुशी कू अहसास ह्वै मैकु,
तबर्यौं डी.टी.सी. की बस आई,
भैजि चल्‍दु छौं प्‍यार सी बताई,
मैं गढ़वाळि कविता लिख्‍दु छौं,
मेरा कविमन मा ख्‍याल आई,
मेरी दूधबोलि भाषा तेरा परताप,
मैंन उत्‍तराखण्‍ड्यौं कू प्‍यार पाई.....



दिनांक 31.1.2016

स्टेट एजेंडा....

उत्‍तराखण्‍ड कू होयुं चैन्‍दु थौ,
गौं, खेत अर खल्‍याण कू विकास,
सब्‍बि उत्‍तराखण्‍डी भै बंधु की,
राज्‍य प्राप्‍ति मा ज्‍व थै आस।
उत्‍तराखण्‍ड बण्‍न का बाद,
पलायन होणु छ लगातार,
मैदान मा खूब चैल पैल,
पहाड़ फर पलायन की मार।

प्राकृतिक संसाधन भौत छन,
जौंसी मिलि सक्‍दु रोजगार,
धरातल फर कुछ नि दिखेणु,
क्‍या होलि कन्‍नि सरकार।

दर्द भौत छ मन मा हमारा,
किलै बंजेणा छन गौं अर सार,
तेरा भाग मा हे उत्‍तराखण्‍ड,
यनु हि लिख्‍युं रै होलु हपार।
उत्‍तराखण्‍ड छोड़िक चलिग्‍यन,
मनखि बल बत्‍तीस लाख,
कनुकै होण खाणी बाणी,
हे सब कुछ ह्वैगि खाक।

मन की चाह बोला,
या स्‍टेट एजेंडा की आस,
पहाड़ मा मनखि रुक्‍वन,
हो सम्‍पूर्ण सतत विकास।
  
जग्‍वाळ छ वे दिन की,
जब स्‍टेज एजेंडा हो लागू,
पहाड़ सी क्‍वी मनखि,
रोजगार का खातिर न भागु।

 स्‍टेट ऐजेंडा पत्रिका का खातिर रचित।
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
ग्राम- बागी नौसा, पट्टी-चंद्रवदनी,
टिहरी गढ़वाळ, उत्‍तराखण्‍ड।


दुर्गति.....


भौत होणि छ,
ये जमाना मा,
बूड बुड्यौं की,
हणाट कणाट का,
दिन बितौणा,
अपणि घर कूड्यौं का,
बण्‍यां छन जग्‍वाळा....

जौंका खातिर खौरी खाई,
ऊन हि पीठ लगाई,
कैन त मरदि बग्‍त,
औलाद कू,
सुख भी नि पाई,
एक दिन औन्‍दि खबर,
बुबाजी या ब्‍वै,
चलिग्‍यन अपणा घौर...

बूड बुड्यौं तैं,
औलाद पूछ्दि छ,
तुम्‍न करि हि क्‍या छ?
हमारा खातिर,
यनु नि सोच्‍दा,
औखु जमानु थौ ऊबरि,
तौंकी पेट पाळै कन्‍नु,
अक्षर ज्ञान दिलौणु,
भारी बात थै,
जमाना का हिसाब सी.....

बुढ़ेन्‍दा का दिन,
भला नि होन्‍दा,
तबरि प्‍यार अर सम्‍मान की,
आस करदु मनखि,
अपणि औलाद सी,
करयुं भी चैन्‍दु,
देव्‍ता समान होन्‍दन,
हमारा ब्‍वै बाब,
जौन हमारा खातिर,
खौरी हि खाई,
अपणि जिंदगी लगाई,
दुर्गति नि करिं चैन्‍दि,
जब तक ज्‍यूंदा छन,
सेवा करा मेवा मिलला.......

रंत रैबार अखबार का खातिर रचित।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
ग्राम.बागी नौसा, पट्टी-चंनद्रवदनी,

टिहरी गढ़वाळ-249122।

हे जिंदगी.....



सदानि त्‍वै जीण का खातिर,
कदम कदम फर,
ठोकर हि लगाई,
कनुकै बितौलु त्‍वै,
मन मेरु कसमसाई,
बितैन जिंदगी का दिन,
रतबेणु जब औन्‍दु,
तब कुछ देर बाद,
सुबेर ह्वै जान्‍दि,
दिन बित्‍दु जब,
ब्‍याखुनि बग्‍त विदा होन्‍दि,
अंधेरी रात ह्वै जान्‍दि,
दिन रात की तरौं,
सुख दुख औन्‍दा अर जान्‍दा,
कबरि हैंसौन्‍दा,
अर रुलौन्‍दा,
बोझ भी लग्‍दि जिंदगी,
कबरि प्‍यारी,
हे प्रभु तेरी लीला न्‍यारी,
जीण हि पड़लि जिंदगी,
बोझ हा या प्‍यारी.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
मेरा कविमन कू कबलाट,

सर्वाधिकार सुरक्षित, 6.1.2016

जिंदगी कू फांच्चु.....




क्‍या बतौण हे दगड़्यौं,
भारी गरु होणु छ,
ज्‍यु कन्‍नु छ भ्‍वीं बिसै द्यौं,
सूर सांसू नि औणु छ...


किलै होलु यु फांचु,
यथ्‍गा गरु होणु,
क्‍या बिगाड़ि मैंन येकु,
किलै होलु रुओणु.......


हंसी खुशी ऊठैं थौ मुण्‍ड मा,
सोचि थौ मौज मनौलु,
नखरु भलु जनु भि होलु,
जिंदगी का दिन लगौलु....


हौर चीज होन्‍दि त,
दगड़यौं मा बांटी देन्‍दु,
अफु हि बोकण पड़दु,
कैमु कतै नि दियेन्‍दु......


बोकणु छौं हे दगड़्यौं,
तुम भी बोकणा होला,
गरु निछ तुमारु फांचु,
मन कू जरा भेद खोला....


देहधारी ह्वैक हम्‍तैं,
यूं फांच्‍चु बोकण हि पड़लु,
क्‍वी बिचारु ऊब्‍ब उठलु,
क्‍वी भत्‍तम ऊद रड़लु......


भलु ह्वान लाल भुला कू,
जिंदगी कू फांचु बताई,
लिख्‍यालि फांच्‍चा पर कविता,
बिचारन कुतग्‍याळि लगाई.....


-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु

दिनांक 5.1.2016

Monday, January 4, 2016

मर्द छौं मैं.......

घन्‍ना भैं का दगड़यान,
घन्‍ना भै भकलाई,
बौजी कू गुलाम छैं तू,
कन्‍दुड़ फर सरक बताई....

यनु सुणिक घन्‍ना भै बबलाई,
दगड़्या तैं वेन तड़ी सी बताई,
हे मर्द कू बच्‍चा छौं मैं,
त्‍वैन मैकु अहसास कराई.....

तेरी बौ का सौं छन मैकु,
वीं सी कतै नि डरलु,
गुलाम बणैक रख्‍लु वीं तैं,
अपणा मन की करलु....

दगड़्या का सामणि वेन,
बौजी फर तड़ी जमाई,
चा बणौ तू झटपट हम्‍कु,
तेरा समझ मा नि आई.....

किल्‍क बौजी घन्‍ना भै फर,
झटपट झाड़ू ऊठाई,
किलै बणौलु चा मैं तुम्‍कु,
बिंगण मा नि आई.....

गिरगिट बणिगी घन्‍ना भै,
दगड़्या कू वेन बताई,
मर्द ह्वैक मैं मर्द निछौं,
क्‍या तेरी समझ मा आई.....

दिनांक 3.1.2016

मलेेथा की कूल