Saturday, February 23, 2013

"मित्रों मेरी अनुभूति"



कवि  नजर से मैंने दुनिया को देखा,
कुछ दोस्त ऐसे होंते हैं,
समय के साथ बदल जाते हैं,
कोई मजबूरी, समय का अभाव,
लाचारी बताते हैं,
आदत मेरी बुरी है,
मुझे दोस्त बहुत याद आते हैं,
सबका पता तब लगेगा,
जो मेरे सच्चे मित्र होंगे,
कंधे पर उनके,
अंतिम यात्रा पर जाऊंगा,
आँखों में उनके आंसू,
अपनी यादों के झरोखे से,
खूब बहाऊंगा.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षति एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
24.2.13

Friday, February 22, 2013

"खूब हैंसा यीं धरती मा"


मनखि आज मनखि नि रैगि,
हैंस्दु भिछ त सुदि दिखावटी,
कन हैंसदा था मनखि,
मेरा मुल्क प्यारा पहाड़,
जबरी दुःख ही दुःख,
फिर भी खुश रन्दा था,
खित खित अर मचौन्दा था,
भारी खिग्चाट,
पाखा पलटे जांदा था,
मुल मुल भि हैंसदा था,
ये जमाना मा ज्यादा सुख सी,
भौत दुखी छन मनखि,
एक हैक्का देखिक भी,
चार दिन किछ या जिंदगी,
खूब हैंसा यीं धरती मा,
यख सदानि कैन नि रण,
बाकि तुमारी मर्जी,
हैंसा या रोवा,
पर केका खातिर....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
22.2.13




Thursday, February 21, 2013

"कै जन्म कू बदलु लेणी छ"

या जिंदगी,
खून भी पेणि छ,
दिदा भुला बोन्न लग्यां,
भला बुरा भी बोन्न लग्यां,
तू भारी भग्यान छैं,
मैन भी बोलि,
ऊंकी ख़ुशी का खातिर,
भारी मौज छ मेरी,
तुमारी कृपा सी,
पर दुःख मन मा,
एक हिछ,
जन्मभूमि पहाड़ सी दूर,
मेरु मन उदास छ,
"कै जन्म कू बदलु लेणी छ"
या जिंदगी.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित,
21.2.2013



 

Wednesday, February 20, 2013

"यथैं वथैं"




जख ह्वै होला दगड़या,
हमारा तुमारा बचपन का,
जौं  दगड़ि लफड़ेन्दा  था,
भ्वीं फुंड माटा मा,
बचपन अपणु खतदा था,
गौं का बाटा मा,
गौं का बण मा,
जौंका  दगड़ि गोरु चरैन,
आरू, घिंगारू, खैणा, तिम्ला,
छकि छक्किक खैन,
मन आज कुतग्याळी,
हर पल लग्दी छन,
आज ऊ दिन कख गैन,
जौं दगड़ि बाळू बचपन,
बिति अर बिताई,
ऊ दगड़या,
आज "यथैं वथैं" ह्वैक,
कख कख चलिगेन.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
20.2.13


 


Tuesday, February 19, 2013

"पतझड़ में...बसंत में"


पतझड़ में...

गिरा दिए पात अपने,
धरा पर वृक्षों ने,
इस आस में,
कि बसंत आएगा,
हमारा श्रृंगार करने,
पतझड़ है,
बसंत के लिए,
मर मिट गया,
बसंत के,
आगमन से पहले......

बसंत में.....

हो रहा है सृंगार,
वृक्षों का,
कहीं कलियाँ,
कहीं फूल,
खिलने लगे हैं,
बौळया बुरांश,
लगा रहे हैं बंणाग,
बांज के बण में,
हमारे पहाड़ में,
खूबसूरत डाँड्यौं में,
चलो निहार आयें,
चन्द्रबदनी मंदिर के पास,
बसंत में........


-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित
20.2.13






Thursday, February 14, 2013

"बौळया बसंत"



बौड़ि ऐगि हे!
लठ्याळी बसंती,
मेरा मुल्क की डांडयौं मा,
खिलला फूल अर हैंसला,
डांडौं अर गंगाड़ फुंड,
डाळी बुटयौं की फाँग्यौं मा...

मेरा ऊलारया मन मा,
मौळयार खुद लगालु,
होलु क्वी भग्यान बिचारू,
डांडौं मा खिल्याँ बुरांशु कू,
रैबार जब मिललु वे,
रौड़ी धौड़ी अपणा मुल्क,
देखण कू आलु...

फ्योंलि बिचारी मैत अयिं,
छयुं छ मौळयार,
पाखौं फुन्ड हैंसण लगिं,
मुल मुल हपार....

हे मेरा मुल्क का मनख्यौं,
बसंत बुलौण लग्युं,
तुमारा ढुंगा होयां मन मा,
होलु कुतग्याळी लगौण लग्युं,
धरती उत्तराखंड की तुमारी,
कन्नि छ जगवाळ,
बौड़ी आवा मुल्क अपणा,
प्यारा कुमाऊँ अर गढ़वाळ,
"बौळया बसंत" छयुं छ.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित अवं ब्लॉग पर प्रकाशित
15 Feb.2013








Monday, February 11, 2013

"सुपिना मा"



कविमन मेरु,
घुमण जरूर जान्दु छ,
ऋतु मौळ्यार का औण फर,
पराण सी प्यारा वे गढ़वाल,
जख हैंसदा अर खिल्दा छन,
पहाड़ का प्रसिद्ध बुरांश लाल...

पर क्या बोन्न तब,
ब्याळी बच्यौं मैं,
बाग का मुख सी,
जब जाण लग्युं थौ,
बांज बुरांश का घनघोर,
लखि बखि बण का बीच,
फूल बुरांश कू टक्क लगैक,
देखण लग्युं थौ...

ऊबरि मैं फर दूर बिटि,
एक बाग गुराई,
भलु हो वे रीक्क दिदा कू,
कुजाणि ऊ कख बिटि आई,
यी पहाड़ का कवि "जिज्ञासु",
वैन वे बाग तैं समझाई,
सुपिना मा मेरी जान बचाई....

डौर लगि तब मैकु भारी,
आँखा खुल्यन जब मेरा,
मैं त अपणा घौर सेयुं थौ,
तब सेळी पड़ि,
ज्युकड़ि मा मेरा

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
सर्वाधिकार सुरक्षित एवं ब्लॉग पर प्रकाशित, 12.2.2013













मलेेथा की कूल